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Wednesday, January 8, 2014

यादें गुजरे ज़माने की -२

मैंने व्योमा जी से आग्रह किया और उन्होंने इस छोटे से लेख के साथ-साथ इस कामिक्स को स्कैन करके भी भेजा. इस कामिक्स को पढ़ते वक़्त ज़ेहन में जैसे किसी सिनेमा का दृश्य बन आया. कामिक्स के सारे पात्र जैसे जीवंत हो आँखों के सामने नाचने लगे. वह गोली चली और सीधे काऊ-ब्वाय हैट में छेद बनाते हुए निकल गई. वह बूट पॉलिश करने वाला गरीब बच्चा दीवार सिनेमा के अमिताभ बच्चन से कम नहीं लगा जो बूट पॉलिश करते समय डायलोग मारता था, "मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता." वही स्वाभिमान उसमें तब दिखा जब वह पुलिस से छुपा कर गधे के पैरों में बूट पॉलिश लगा देता है, और कहानी का पटापेक्ष भी उसी घटना से होती है. फिलहाल यह कामिक्स और यह लेख आपके सामने है. शुक्रगुजार हूँ व्योमा जी का..पिछला लेख पढने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं. अथवा व्योमा मिश्रा के लेवल पर भी चटका लगा सकते हैं.
 
आज फ़िर एक  कॉमिक्स हाथ पड़ी, उसी जूनून, उसी जज़बे से एक ही बैठक  में उसी तरह से पढ़ डाली जिस तरह तब पढ़ी थी जब नई-नई, कोरे काग़ज़ और काली स्याही की गंध के साथ पहली बार मेरे हाथ आई थी, कॉमिक्स का   नाम है 'रेगिस्तानी लुटेरे'

कहानी केंद्रित है एक इससे बूढ़े आदमी पर जो बहुत-बहुत बहुत ही अमीर है, उसकी सोने की खान है 'शैतान की आँत'. इस बूढ़े का नाम है जोसिया रिम्फ़ायर और काम है 'शैतान की आँत' से सोना खोदना, उसे अपनी घोड़ागाड़ी पर लादना और उस सोने को बैंक में 'पटक' आना.

इस बूढ़े का दिन का पता होता 'शैतान की आँत' और शाम का होता 'माँ केसिनो' का जुआघर, जिसकी मालकिन उसकी दोस्त होती है. दिन भर पसीना बहाना और शाम को महँगी सिगार के साथ जमकर शराबनोशी करना और करना जी भर कर जुआखोरी.. 'जो' कि ज़िन्दगी में 'भयावह' मोड़ उस वक़्त आता है जब एक 'अविश्वसनीय' चिट्ठी उसे मिलती है, ये चिट्ठी उसकी एकमात्र रिश्तेदार,युवा भतीजी रोज़ी ने भेजी है. इसमें लिखा होता है कि वह अपना शेष जीवन अपने एकमात्र जीवित रिश्तेदार यानि 'जो' के साथ बिताने आ रही है.

'जो' जिसकी सोच है कि आजकल ( लगभग ३० बरस पहले) की लड़कियाँ  बदतमीज़, बदमिजाज़ और बददिमाग़ होती है और वह अपनी ज़िन्दगी में ऐसी कैसी लड़की को नहीं फ़टकने नहीं देगा, परन्तु मजबूर हो जाता है जब 'माँ'  याद दिलाती है वह रोज़ी को बहुत पहले ही साथ रहने का निमंत्रण दे चुका है।

बहरहाल, रोज़ी की मुलाक़ात रिप किर्बी से होती है जो संयोगवश उसी शहर जा रहा होता है। रोज़ी को हवाईअड्डे से लाने के लिए जो को 'माँ' द्वारा ज़बरदस्ती भेजा जाता है। ज़ुए की जमी बाज़ी से जो को उठाना मज़ाक नहीं। घर आने पर जो रोज़ी के आने पर रात्रिभोज देता है और पाता है कि रोज़ी को एक अत्यधिक अनुशासित, संयमी और मर्यादित लड़की के रूप में।  रोज़ी अपने बाबा को सुधारने में जुट जाती है। इस बॉक्स को पढ़कर  आज वो मुस्कराहट आ गयी जो पहले नहीं  आयी थी जिसमें रोज़ी 'जो' को महँगी सिगार, मँहगी शराब के साथ ही जुए से दूर रखती है और रोज़ी के पीठ फ़ेरते ही 'जो' नॉन-स्टॉप पैग पर पैग चढ़ाता चला जाता है वो समय था जब मैं बच्ची थी और एक पक्के पियक्कड़ की तड़प को महसूस नहीं कर पायी थी. मेरे लिए 'जो' सिर्फ़ डर के कारण चोरी से, छिप-छिप के  शराब पीने वाला बूढ़ा आदमी होता है।  आज तो ये इस बॉक्स पर बेसाख्ता हँसी ही छूट पड़ी जब 'जो' किर्बी और 'माँ' के सामने अपना दुखड़ा बयाँ करता है कि 'मेरी भतीजी मुझे न शराब पीने देती है, न सिगार, न जुआ खेलने देती है, न....' और 'माँ' सलाह देती है 'तुम पोलो क्यों नहीं....?' अगला तीर किर्बी मारता है 'बाग़वानी भी एक अच्छा शौक़ है'.... ख़तरनाक रेगिस्तानी 'चूहा' कितना असहाय हो जाता है. इधर बिल्मि के मन में रोज़ी को ले के कुछ है, वरना आज रात चाँद उसे इतना सुंदर क्यूँ लगता भला?

खैर कभी-कभी ये चरित्र बाल-मन में विदेशों सभ्यता के बारे में भी सोचने को मजबूर करते थे. मैं सोचती थी की क्या विदेशों में लड़कियाँ खुले-आम सिगार पीतीं हैं , जब रोज़ी 'जो' के मुहँ से सिगार ले लेती है और 'जो' बड़ी दीदादिलेरी से कहता है "रोज़ी ये क्या? तुम्हें सिगार चाहिए तो माँग लेती मुझसे". उन दिनों बालों में ढेर सारा तेल चुपड़ के फुंदे-वाली दो चोटियाँ बाँधने वाली मेरे जैसी लड़की के लिए इतने बरसों पहले किसी लड़की का सार्वजानिक रूप से सिगार या शराब पीने के बारे में सोचना तक दिल को दहला देता था।

चलिये कहानी पर आते हैं..... 'जो' की दौलत पर निगाह रखनेवाले ड्यूक को अपनी साज़िश को अंजाम देने के लिए रोज़ी एक मोहरे के रूप में नज़र आती है. एक बार जब 'जो' रोज़ी को रेत पर घुड़सवारी के लिए दूर गहरे रेगिस्तान में ले जाता है तब ड्यूक अपने दो साथियों फ्रैंकी और पीटर के साथ उनपर  हमला बोल देता है, ये फ्रैंकी और पीटर वही हैं जो इसी कहानी में 'जो' से मात खा चुके हैं ( पहले पन्ने पर ) पर इस बार 'जो' कुछ नहीं कर पाता क्यूँकि हथियारों की आदत भी 'सुधारने' के चक्कर में रोज़ी उसकी पिस्तौल बिल्मि के हवाले कर आती है, नतीजतन लुटेरे अपने मंसूबों में क़ामयाब हो कर रोज़ी का अपहरण कर लेते हैं  .... ख़तरनाक़ रेगिस्तानी 'चूहा' सचमुच असहाय हो जाता है।

और अब रोल है रिप का जब शुरू होता है दौर फिरौतियों का, रोज़ी के अपराध-बोध का और 'जो' की तड़प का जो अपनी 'सुधारने-वाली' भतीजी को पाने के लिए अपनी सारी दौलत दाँव पर लगाने का माद्दा रखता है। ये वही बूढ़ा रईस है जिसके सामने बैंको के मालिक कहते है 'अगली बार आप इतना सोना और लाये तो हमें ये बैंक ही आपको बेचना पड़ेगा', जिसके बारे में प्रचलित था कि मुसीबत में तेल के मालिक शेख भी 'जो' के पास आते हैं। आज भतीजी के प्रेम में दुनिया का सबसे ग़रीब आदमी बन चुका था।
खैर, जासूस रिप की मदद से रोज़ी मिल जाती है। इस पूरे घटना-क्रम में अहम भूमिका होती है एक बूटपालिश वाले लड़के और एक बूढ़े कुत्ते 'सुल्तान' की।

अंत में दो बड़े नाज़ुक मोड़ आते हैं -
पहला: जब रोज़ी से लिपट के बाबा कहते हैं ' रोज़ी बेटी, तुम जैसा चाहो मुझे सुधार लो।' और रोज़ी "बाबा 'जो' अब मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं करूँगी"
दूसरा: जब बूटपॉलिशवाले लड़के टिमोथी को 'जो' पढाई के खर्चे का चेक देते हैं और टिमी कहता है "ओह रिम्फ़ायर साब, कॉलेज में पढ़ने जाना है या उसे खरीदना है ?"

कामिक्स डाउनलोड करने का लिंक

Monday, January 6, 2014

ईमानदारी के नमूने

आजकल खुद को ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने कि बाढ़ आई हुई है. तो चलिए देखते हैं ईमानदारी के नमूने. इन चारों फोटो को देखिये, "गृहस्थ वेताल" कामिक्स से निकाला हूँ. इसमें वेताल को शौक चढ़ा कि वह अपराध कि रोकथाम बंद कर एक शरीफ शहरी जीवन जीना शुरू करे. ईमानदारी भरा...

मैं जब भी शत-प्रतिशत ईमानदारी कि बात सुनता हूँ तो मुझे ये चारों पेज याद आते हैं. कभी ये सोचता हूँ कि मान लिया जाए की सभी सरकारी संस्था ईमानदार हो जाए तो? अपने आस-पास ही टटोलना शुरू करता हूँ. मेरे घर के पास जो ठेले पर मशाला डोसा बेचता है और हर रोज 70 रुपये पुलिस को देता है, और पुलिस को गाली भी देता है की वो पैसा लेती है. सबसे पहले उसका ठेला लगना बंद होगा. फिर हम जैसे लोग जो पुलिस को रोज उससे पैसा लेते देखते हैं और पुलिस को गाली देते हैं, हम जैसे लोग जिन्हें कभी खाना बनाने का मन ना हो तो वहां जाकर डोसा खाकर पेट भर लेते हैं, हम जैसे लोग फिर भी पुलिस को गाली देंगे कि उसने ठेला बंद करवा दिया.

ऊपर तो सिर्फ एक छोटा सा उदहारण दिया हूँ. सनद रहे, मैं पुलिस द्वारा लिए जा रहे पैसे का पक्ष लेकर उसे सही नहीं बता रहा हूँ. बस इतना ही कहना चाह रहा हूँ की हमें वैसा ही समाज मिलता है जैसे हम खुद हैं. नेता, पुलिस, सरकारी कर्मचारी, दफ्तर में हमारे सीनियर्स. सभी...

फिलहाल तो इन चार पृष्ठों का लुत्फ़ उठायें..



Wednesday, December 25, 2013

यादें गुजरे लम्हों की

वक़्त गुज़र गया, ज़माने हुए हमें दुनिया के सामने आये हुए. प्रशांत से जब बात हुई तो हमने खोई हुई व्योमा को फ़िर से ढूँढने कि कोशिश की. व्योम… और उसका दुनिया 'वर्ल्ड' से पहला परिचय करवाया पिता ने. उन्होंने मेरे लिए नंदन, चंदामामा, बाल-भारती और इंद्रजाल कॉमिक्स की नियमित बंदी लगवाई थी. इसके अलावा हमारे घर में कादम्बिनी भी आती थी पर मैं दीवानी थी इंद्रजाल कॉमिक्स की. वेताल और मेंड्रेक मेरे हीरो थे. हमारे घर में जो कॉमिक्स देनेवाले अंकल आते थे उनकी आँखे पीली थी, बहुत प्यार करते थे. हर हफ़्ते सोमवार का इंतज़ार रहता था.

जब वो कॉमिक्स ले के आते थे तो मैं जैसे सारी जंज़ीरें तोड़ के भागती थी. किसे फ़िक्र थी फ्रॉक के बटन लगे हैं के नहीं, किसे फ़िक्र थी बाल बँधे हैं कि खुले बस इस हफ्ते वेताल आयेगा या मेंड्रेक दोनों में से कोई भी मिला तो मज़े. गार्थ मिला तो रोना शुरू.. कभी भाग-१ हुआ तो इंतज़ार ज़माने भर का. भाग-२ के मिलते ही अंकल को रोककर सबसे पहले आखरी पन्ना देखती कि भाग-३ तो नहीं? यदि हुआ तो पीली आँखों वाले अंकल पे लात-घूंसे बरसाना शुरू खैर बाक़ी हरक़तें बाद में. एक बार डेढ़ महीने वेताल-मेंड्रेक गायब थे तब फोकस हुआ किर्बी, नोमेड, ब्रूसली, गार्थ और सॉयर से.

बचपन के दिनों की यादें या यूँ कहें जज़बात बाँट रही हूँ. आप भी सुनिये किस्से कॉमिक्स-दीवानी के, तो शुरू करें? एक नंबर है 'भुतहा मकान' दिल के बहुत क़रीब.. पहले तीन बॉक्सेस से ही चार जिज्ञासाएँ निकलीं :
१.' कैरेबियन सी' क्या है?
२. 'गोताखोरी का रेकॉर्ड' मतलब?
३. 'अफ्रीका' कहाँ है?
४. डुप्लीकेट मतलब?
अब इंतज़ार था पापा का आते ही घेर लिया.. ५ मिनिट में जवाब देके छूटे और मैं फ़िर बॉक्स १ से शुरू. फ़िर थोड़ी देर में पापा से, 'पापा, दवाई लेने से भूत दिखतें हैं?' (पापा असमंजस में) और मैं पढ़ती जा रही हूँ। पापा से पूछा मेरे पास भेड़िये की खाल क्यूँ नहीं है (मेरे पापा मुझे अपनी राजकुमारी कहते थे)

'सेंडविच', और 'भूत-पूर्व उड़ाका' का अर्थ जानने के बाद मैं व्यस्त हो गयी थोड़ी देर बाद पूछा 'शून्य-दृष्टता' क्या होती है? फ़िर जानवर क्यूँ पूँछ हिलाता है.. जानवर का चाटना प्यार का सूचक होता है.. ये जाना काँटा निकालने के बाद जंगली जानवर को भी भरोसे से जीता जा सकता है.. सीखा जब वो रेने पर आरोप लगाता है और रेने की आँखों में आँसू (तब मेरी ऑंखें नम हो गयीं थीं फ़र की नरमाहट मैं भी भूल गयी थी ).. बाद मुद्दत के जब पति-पत्नी के संवाद में 'मुझे नहीं देखना हाथ लगाके' कैसा दर्द था.. फ़िर 'मुझे लगता है उस भेड़िये की खाल क्रिस्टी ने ओढ़ रखी है।' घर में,क्रिस्टी पूछती है 'मेरा फ़र कहाँ रखा है?(वो तो सामने की कुर्सी पर ही रखा होता है).. टेलीग्राम के बाद 'मैंने सही कहा था न मैंने भेड़िया देखा था'....'तुम हमेशा सही कहते हो.....'
how sweet......


मेरे आग्रह पर व्योमा मिश्रा जी ने यह लिख भेजा मुझे और यह कामिक्स भी, जिसे मैं आप दोस्तों के साथ शेयर कर रहा हूँ.
डाउनलोड लिंक के लिए यहाँ क्लिक करें

Thursday, September 22, 2011

चित्रकथा दस मिनट का रफ प्रीव्यू

चित्रकथा का करीब दस मिनट का रफ प्रीव्यू, ख़ास आप सभी कॉमिक्स दीवानों के लिए:

Tuesday, March 29, 2011

चित्रकथा के वीडियो टीज़र्स ख़ास आपके लिए

प्रिय मित्रों यदि आप फेसबुक पर हमारे चित्रकथा पेज के सदस्य हैं तो आपको पता ही होगा  कि हमने चित्रकथा  के वीडियो टीज़र्स वहाँ रिलीज़ करने शुरू किये हैं... यहाँ प्रस्तुत हैं हमारे दो टीज़र्स ख़ास आपके लिए...आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा - आलोक शर्मा (चित्रकथा) 



Sunday, February 14, 2010

वेलेंटाइन-दिवस पर अपनी कामिक्स वाली माशुकाओं की याद में...

.....एक पूरा अर्सा ही बीत गया था इस ब्लौग पर कुछ लिखे हुए। आज अचानक वेलेंटाइन-दिवस के इस प्रेमोत्सव पर कुछ लिखने का मन आया तो स्वभाविक रुप से उन माशुकाओं की याद आयी जिनके साथ पला-बढ़ा हूँ। वेलेंटाइन-दिवस...पूरे सप्ताह के अलग-अलग दिनों को अलग-अलग नामों और अलग-अलग ढ़ंग से मनाती एक पूरी पीढ़ी मुझे अचानक से प्रौढ़ हो जाने का अहसास दिलाती है...और इस अहसास से उदास हुआ मन धम्म से बैठ जाता है कुछ पुरानी यादों का पुलिंदा खोल कर। मन का वो आशिक-कोना, जो एक बचपने में ही जवान हो गया था और अब तलक जवानी की उस चौखट पर सर रगड़ रहा है, उसी पुलिंदे से निकालता है एक फ़ेहरिश्त अपनी चंद चिरयुवा प्रेमिकाओं की। नहीं, इस "प्रेमिका" शब्द से धोखा न खायें। ये पूर्णतया एकतरफा इश्क का मामला है।...मामला है? नहीं, "मामले हैं" कहना उचित होगा। आइये नजर दौड़ाइये मेरे साथ ही इस फ़ेहरिश्त पर कि जानता हूँ मैं कि मेरे जैसे जाने कितने ही जवान हुये वो बचपन वाले आशिकों की फौज ने किस-किस जतन से इस फ़ेहरिश्त को संभाले रखा है युगों-युगों से।

फ़ेहरिश्त की क्रमवार सूचि में भले ही ढ़ेरों दुविधायें हों, किंतु पहले स्थान पर निर्विवाद रूप से डायना थी, है और रहेगी- अनंत काल तक। हैंग ऑन! हैंग ऑन!! मैं प्रिंस चार्ल्स वाली राजकुमारी डायना
की बात नहीं कर रहा। मैं बात कर रहा हूँ डायना पामर की...अपने, हमसब के हीरो वेताल उर्फ फैंटम उर्फ चलते-फिरते प्रेत की प्रेयसी और पत्‍नि डायना की। वो पहली नजर का पहला प्यार वाला
किस्सा था डायना के संग। उधर वेताल को हुआ, इधर मुझे भी। इंद्रजाल कामिक्स के उन पन्नों में मंडराती किसी स्वप्न-सुंदरी सदृश ही डायना एकदम से दिन का चैन और रातों की निंदिया उड़ा ले गयी थी उन दिनों। ये उन दिनों की बात है, जब अपने फैंटेसी की मनमोहक दुनिया बसाया हुआ बचपन सहर्ष ही किट और हेलोइश जैसे प्यारे-प्यारे जुड़वां बेटे-बेटी का पिता कहलाने को तैयार था। हवा-महल के उन सुहाने दिनों में, बौने बंडारों के जहर बुझे तीरों के सुरक्षा-घेरे में, खोपड़ीनुमा गुफा की उन ठंढ़ी तलहटियों में, शेरा और तूफान के संग वाली सैरों में और वेताल के साथ-साथ ही मंडराती चुनौतियों के खिलाफ़ छेड़ी हुई जंगों में...खिलखिलाती मचलती हुई डायना...उफ़्फ़्फ़्फ़!!! ...और जब अपने मि० वाकर उर्फ चलते-फिरते प्रेत ने प्रणय-निवेदन किया था हमारी डायना से और फिर डायना का उस निवेदन को सहर्ष स्वीकारना...आहहा! कैसा माहौल था वो खुशनुमा!! मानो डायना ने हमारा प्रणय-निवेदन ही स्वीकारा हो प्रत्यक्षतः.... :-) शायद याद हो आपसब को कि शादी में सुदूर ज़नाडु से चलकर अपना प्यारा जादूगर खुद मैण्ड्रेक भी आया था समारोह में हिस्सा लेने।

...और मैण्ड्रेक के साथ ही याद आती है प्रिसेंज नारडा। नारडा के ही महल के बगीचे में मैण्ड्रेक का इजहार अपने प्यार का राजकुमारी नारडा के प्रति और फिर

नारडा का ज़नाडु में स्थानंतरित होना लोथार और मोटे बटलर का साथ देने, शायद इंद्रजाल कामिक्स की दुनिया का एक और शो-केस इवेंट था। इसी फ़ेहरिश्त में यूं तो बेला भी शामिल थी, लेकिन बीतते वक्त के साथ उसकी तस्वीर तनिक धुमिल हो गयी है। बहादुर की बेला। कहानी के प्लाट में तमाम विविधतायें होते हुये भी बेला का तनिक रफ और टफ व्यक्तित्व मुझे ज्यादा रास नहीं आता। कराटे में वैसे तो डायना भी ब्लैक-बेल्ट थी, लेकिन फिर भी उसकी नजाकत और उसके जिस्म का लोच एक अलग ही अफ़साना बयान करते थे।

फ़ेहरिश्त में आगे चंद और विदेशी नायिकाओं का आगमन होता है। यकीनन लुइस लेन मेरे लिये
डायना के समक्ष ठहरती है। डेली प्लानेट के सौम्य और मृदुभाषी रिपोर्टर क्लार्क केंट की दोस्त और प्रेयसी जब क्लार्क केंट को सुपरमैन के ऊपर तरजीह देती है, एक झटके में मेरा दिल ले जाती है। बात उन दिनों की है जब अचानक से इंद्रजाल कामिक्स का प्रकाशन बंद हो गया था और विदेश से आनेवाले मेरे एक रिश्तेदार ने मेरे कामिक्स-प्रेम को देखते हुये मेरे लिये चंद डीसी और मार्वल कामिक्स का पूरा सेट उपहार में लेकर आये थे। उन दिनों जब डायना दिखनी बंद हो गयी थी, लुइस लेन आयी थी एक बहुत ही मजबूत विकल्प बन कर। सुपरमैन की प्रेयसी किसी भी मामले में कहीं भी सुपरमैन से कम नही थी{है}। याद आता है मुझे क्लार्क कैंट और लुइस का विवाह और उन दिनों किसी कारणवश सुपरमैन अपनी सारी शक्तियाँ खो चुका था, तब तमाम विपदाओं से लड़ती हुई लुइस लेन ने अकेले ही क्लार्क कैंट को मुसिबतों से निकाला था। लुइस लेन और मेरा प्रेम-प्रसंग अभी जारी है कि हर महीने मेरे पास अभी भी डीसी कामिक्स से सुपरमैन के निकलने वाले तीन टाइटल्स लगातार आ रहे हैं।

...और इसी जारी प्रेम-प्रसंगों की एक सबसे प्रबल प्रतिभागी है मेरी जेन। जी हाँ, अपने नेक्स्ट डोर
नेबर पीटर पार्कर उर्फ स्पाइडर मैन की मेरी जेन । दि बोल्ड एंड सेन्सुअस मेरी जेन...उफ़्फ़्फ़! उन तमाम बनते-बिगड़ते रिश्तों की उलझनें, उन तमाम विलेनों के संग की उठा-पटक, उन तमाम रातों की चिंतित करवटें जब पीटर अपने स्पाईडी अवतार में दुश्मनों की बैंड बजा रहा होता है...मैंने मेरी जेन का साथ निभाया है। इस लिहाज से मैं कई बार चक्कर में भी पड़ जाता हूँ। चक्कर में कि मेरी जेन या डायना पामर...?? मेरी या डायना...??? और इस चक्कर में डायना का पलड़ा भारी करने हेतु मैं कभी इंटरनेट पे तो कभी कबाड़ियों और पुराने दुकानों के गर्द पड़ चुके कोनों में फैंटम कामिक्सों को तलाशते रहता हूँ। इंद्रजाल कामिक्स के लुप्तप्राय हो जाने के बावजूद अब भी जुड़ा हुआ हूँ येन-केन-प्रकारेन फैंटम की दुनिया से...तो डायना का पलड़ा हमेशा भारी ही रहता है।

इसी फेहरिश्त में कहीं पर सेलिना भी है। सेलिना....कैट वोमेन...बैटमेन की प्रेमिका। वैसे शायद प्रेमिका कहना अनुचित होगा। क्योंकि सेलिना का अपराधिक-चरित्र और बैटमैन का अपराध को समूल नाश करने का लिया गया वचन इस प्रसंग को आगे बढ़ने से रोकता है। किंतु अपने अल्टर-इगो में ब्रुस वेन कही-न-कहीं सेलिना के प्रति झुकाव तो महसूस करता ही है और उसी झुकाव की वजह से हम बैटमैन के चाहनेवाले भी दिलोजान से कामना करते रहते हैं कि ये खूबसूरत सेलिना छोड़ क्यों नहीं देता है चोरी-चकारी।

...और यहाँ से फेहरिश्त वापस मुड़ती फिर से होम-ग्राउंड की ओर।
ध्रुव की सहचरी कमांडर नताशा हो या फिर नागराज की प्रेयसी विसर्पी हो या
हो अपने डोगा की संगिनी सोनु उर्फ मोनिका । कुछ और नाम भी जुड़ते चले
जा रहे हैं, लेकिन पोस्ट तनिक लंबी होती जा रही है। ...तो फेहरिश्त की अगली किश्त फिर कभी फुरसत में जब अगली
बारआता हूँ पोस्ट लिखने। तब तक के लिये मेरे ही जैसे आपसब तमाम आशिकों को सलाम...!

.....

Sunday, January 4, 2009

बहादुर की लाल हवेली और नासुद कि शुरूवात

बहादुर चंबल के नामी डाकू का बेटा होते हुये भी आखिर कैसे नागरिक सुरक्षा दल(नासुद) का संस्थापक बना? इन सारी गुत्थियों को सुलझाता हुआ यह कामिक्स है.. इसमें बहादुर के बदले की आग और डाकुओं का हिंसक व्यवहार, इन दोनों को मिलाकर कहानी का तानाबाना बुना गया है.. कुल मिलाकर मैं इतना कह सकता हूं कि जो कोई भी इसे एक बार पढ़ना शुरू करे वो खत्म करके ही उठेगा..

आप यह कामिक्स इस चित्र पर क्लिक करके डाऊनलोड कर सकते हैं..


या फिर यहां क्लिक करें..

यह कामिक्स जब आयी होगी उस समय मैं शायद 5-6 साल का रहा होऊंगा, सो मुझे ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है इस कामिक्स की.. अगर मेरे किसी मित्र को इसके बारे में जानकारी हो तो बताने का कष्ट करें.. उसे मैं अगले पोस्ट का हिस्सा जरूर बनाऊंगा.. धन्यवाद..

Thursday, October 2, 2008

अफलातून का व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई



क्या इसे देखकर आपको कुछ याद आया? जी हां, यह इंद्रजाल कामिक्स के अंत में दिया जाने वाले कुछ कार्टून चरित्रों में से एक है.. मुझे इनका इतिहास कुछ भी पता नहीं है मगर यह जरूर याद है कि जब बहुत छोटा था तब गुणाकर के चित्रों को बड़े ध्यान से देखता था.. अफलातून के कार्टून्स उस समय मेरी समझ से बाहर कि बात हुआ करती थी.. अगर मेरे पाठकों में से किसी को कुछ पता हो इन चरित्रों के बारे में तो कुछ बताने का कष्ट करें..

धन्यवाद..

Friday, September 5, 2008

चरित्र जाने अनजाने भाग १ (इंद्रजाल कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित अनजान चरित्र)

डोगा वाली पोस्ट में मैंने कहा था कि कुछ अनजाने चरित्रों के बारे में बात करूँगा मगर समय के अभाव में लिखना संभव न हो पाया. बीच में एक बार लिखने का मूड भी बना तो एस्टरिक्स के विषय में पोस्ट दे मारी ऐसे में हमारे अनजाने चरित्र बेचारे फिर से उपेक्षित रह गए. चलिए देर आयद दुरुस्त आयद आज उनकी बातें करें जो बेचारे कॉमिक्स की दुनिया में चुप चाप आए और खामोशी की चादर ओढे गुमनामी की गर्त में खो गए, कभी इस असफलता के पीछे कहानियों का अभाव रहा कभी mainstream सुपरहीरोज़ के दीवाने पाठकों की बेरुखी. कारण जो भी हो मगर बड़ा बुरा लगता है कि ब्लॉग की दुनिया में भी इन बेचारों का ज़िक्र कभी कभार भूले भटके ही देखने को मिलता है.
इससे पहले कि इन किरदारों की बातें शुरू करुँ सोचता हूँ ज़रा सा परिचय भारतीय कॉमिक बुक इतिहास से भी कराता चलूँ.
भारत में कॉमिक्स का आगमन वैसे Illustrated Weekly Of India के साथ हुआ (यदि यह information ग़लत है तो सुधि पाठक कृपया मुझे सुधारेंगे) जिसमें साप्ताहिक कॉमिक स्ट्रिप्स छपा करती थी. मगर सही मानो में कॉमिक्स की शुरुआत हुयी टाईम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप की इंद्रजाल कॉमिक्स के साथ, जिसमें एक लंबे समय तक फैंटम, मेंड्रेक और फ्लैश जैसे विदेशी सुपर हीरोज़ छाये रहे. मगर वक्त के साथ भारतीय नायकों की कमी महसूस की जाने लगी ऐसे में १९७६ में आबिद सुरती (जिन्होंने भारत की प्रथम कॉमिक स्ट्रिप बटुक जी की रचना की थी) ने रचना की बहादुर की और गोविन्द ब्राह्मणिया (जो कि उन दिनों इंद्रजाल कॉमिक्स के कवर बनाया करते थे) के चित्रों से सजे बहादुर बेला के कारनामे लोगो के दिल को बहलाने लगे.
बहादुर की सफलता से प्रभावित हो कर प्रकाशकों ने कुछ और भारतीय चरित्रों की कॉमिक्स निकलने का प्लान बनाया और प्रदीप साठे द्वारा रचित 'आदित्य - अनजान लोक का मसीहा' की कहानियाँ १९८७ से इंद्रजाल में प्रकाशित होने लगी (आदित्य की कहानियाँ किसने लिखी हैं यह अज्ञात है).
आदित्य की कहानी शुरू होती है जब एक दिव्य शक्तियों वाला भिक्षुक सन्यासी आदित्य हिमालय की तराई में बसे किसी गाँव आ पहुँचता है. अपने origin के विषय में आदित्य ख़ुद भी कुछ नहीं जानता. बहरहाल आदित्य की कहानियाँ बड़ी जल्दी बंद हो गई और साथ ही उसका रहस्य भी रहस्य ही रह गया. १९८८ में इंद्रजाल ने प्रकाशित करनी शुरू की दारा सीरीज़. दारा की कहानियाँ कामिनी उप्पल की थी और चित्र प्रदीप साठे के.
(लेखिका कामिनी उप्पल की जानकारी और उपरोक्त चित्र साभार इस ब्लॉग से) दारा का किरदार काफ़ी कुछ ऐसा था कि अब सोच कर लगता है कि वह ब्रूस वेन और James Bond का मिला जुला रूप था. दारा ब्रूस की तरह काफ़ी मालदार हीरो था, जहाँ ब्रूस की संपत्ति खानदानी है वहीँ दारा दरअसल काश्मीर के एक राजघराने का इकलौता वारिस है और उसका असली नाम है राणा विक्रम वीर सिंह, रियासत के लोग उसे राजा साहब कह कर बुलाते हैं. इंटेलिजेंस विंग के मुखिया मि. राव और कुछ ख़ास लोगो के अलावा कोई भी दारा की असली पहचान नहीं जानता. इंटेलिजेंस विंग के Spy के रूप में दारा अपना मिशन पूरा करके अपनी रियासत कब पहुँच जाता है ये कामिनी उप्पल और प्रदीप साठे के अलावा कोई नहीं जानता. मैंने दारा की कुछ कॉमिक्स बचपन में पढ़ी हैं पर दारा का प्रकाशन कब बंद हुआ इस विषय में मैं अनभिज्ञ हूँ. इन्टरनेट पर काफ़ी खोजने पर सिर्फ़ यह ब्लॉग हाथ लगा जिसके मुताबिक दारा की कुल आठ कहानियाँ प्रकाशित हुयी हैं और अप्रैल १९९० में इंद्रजाल का प्रकाशन बंद होते ही दारा की कॉमिक्स बंद हो गई.

(अनजाने चरित्रों की फेहरिस्त काफ़ी लम्बी है और उनकी कहानियाँ भी यदि यह पोस्ट आपको पसंद आयीं हो तो अपनी कमेंट्स देंगे और मैं भाग २ लिख कर पोस्ट कर दूँगा, इच्छा है कि कुछ शेरबाज़, अनोखा चोर रुस्तम, अंगूठे लाल, सागर सलीम, जौहर, राजा और पिद्दी पहलवान पर भी लिखूं ये सारे चरित्र मनोज कॉमिक्स और राज कॉमिक्स पर समय समय पर प्रकाशित हुए और वक्त के साथ गुमनामी के अंधेरों में खो गए, इनके अलावा मानसपुत्र और डिटेक्टिव कपिल पर भी लिखने की इच्छा है जो कि अनुपम सिन्हा कि कलम से तब निकले थे जब सुपर कमांडो ध्रुव का जन्म भी नहीं हुआ था.)

- आलोक

पुनःश्च : काफ़ी माथापच्ची के बाद भी आदित्य की कोई इमेज इन्टरनेट पर नहीं मिल पायी।