Tuesday, March 29, 2011

चित्रकथा के वीडियो टीज़र्स ख़ास आपके लिए

प्रिय मित्रों यदि आप फेसबुक पर हमारे चित्रकथा पेज के सदस्य हैं तो आपको पता ही होगा  कि हमने चित्रकथा  के वीडियो टीज़र्स वहाँ रिलीज़ करने शुरू किये हैं... यहाँ प्रस्तुत हैं हमारे दो टीज़र्स ख़ास आपके लिए...आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा - आलोक शर्मा (चित्रकथा) 



Wednesday, January 19, 2011

उफ्फ़ ये डोगा का सिनेमा भी ना..


यह ना तो फिल्मी गॉसिप है और ना ही भारतीय कामिक्स प्रेमियों के लिए सनसनी.. यह तो मात्र एक ऐसे कामिक्स प्रेमी की व्यथा है जो भारतीय कामिक्स कैरेक्टर को सिल्वर स्क्रीन पर देखना चाहता है..

पिछले लगभग दो सालों से सुन रहा हूँ कि अनुराग कश्यप जी डोगा को सिल्वर स्क्रीन पर उतारना चाहते हैं.. जब मैंने यह पहली दफे सुना था तब मन में सबसे पहला सवाल यही उठा था की कौन सा भारतीय अभिनेता शारीरिक तौर से इतना फिट है, फिर पता चला कि कुनाल कपूर को इसके लिए चुना गया है और वह जीतोड मेहनत भी कर रहे हैं ऐसा उनके ही किसी Interview में पढ़ा भी.. कई अन्य सवालों में से एक प्रमुख सवाल मेरे मन में आया था, वह यह कि मोनिका का रोल कौन करेगी? क्या मुंबई के गटर के भीतर सच में इतनी जगह होती है क्या जिसमें से डोगा आराम से आ-जा सके? और यक़ीनन जब अनुराग कश्यप सिनेमा बनाएंगे तो सूरज और मोनिका को पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचते-गाते तो नहीं ही दिखाएँगे..

खैर यह सब भी होता ही रहेगा, और अनुराग जी पर इतना भरोसा तो जरूर है कि वह जब भी बनाएंगे तो वह एक क्लासिक चीज ही होगी.. मगर सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर दो साल से सुनते-सुनते अभी तक कहीं यह चर्चा क्यों नहीं सुना कि यह फ़िल्म बन रही है? हर जगह यही क्यों पढ़ने को मिलता है कि फ़िल्म बनेगी?

मैंने इस बाबत कुछ छानबीन की और पता चला कि अनुराग जी पूरे मन से इसे बनाने को तैयार हैं, मगर डोगा के कापीराईट को खरीदने के लिए पैसे को लेकर मामला अटक गया है.. और अभी गेंद राजा पाकेट बुक्स के पाले में है.. अब अंदर कि खबर क्या होगी यह तो अनुराग जी और संजय गुप्ता जी ही बताएँगे.. मगर मेरी समझ यही कहती है कि अगर इस पर सिनेमा बनती है और वह थोड़ी भी चर्चा पाती है तो इसका सीधा फायदा राजा पाकेट बुक्स को ही मिलेगा, क्योंकि मेरी जानकारी में राज कामिक्स(सनद रहे, राज कामिक्स राजा पाकेट बुक्स का ही एक हिस्सा है) का मुनाफा दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है, और अगर यह सिनेमा सिल्वर स्क्रीन पर आती है तो यह हित रहे या फ्लॉप मगर इसका सीधा फायदा डोगा की कामिक्स की बिक्री को होगा.. और यक़ीनन उसकी बिक्री पहले से अधिक भी होगी..

खैर, मैं भी आप पाठकों की ही तरह इन्तजार में हूँ कि कब हमें यह सिनेमा सिल्वर स्क्रीन पर देखने को मिलता है..


आज के इस पोस्ट के साथ मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर अब से इस ब्लॉग पर वैसा कोई भी कामिक्स आपको पढ़ने को नहीं मिलेगा जो फिलहाल बाजार में उपलब्ध है.. अभी जिस किसी पोस्ट में ऐसे लिंक उपलब्ध हैं उसके लिंक धीरे-धीरे Deactivate किया जा रहा है.. धन्यवाद..

Tuesday, July 6, 2010

आइये, कॉमिक्स से नयी पीढ़ी का विकास करें!


कॉमिक्स काफ़ी सारी विविधता और किरदारों के साथ आती है. साथ ही कॉमिक्स का सबसे बड़ा फायदा किसी बच्चे (खासकर slow learners or differently abled) के विकास मे होता है. सिर्फ बच्चे ही क्यों बड़ो को भी समान रूप से कॉमिक्स पढने का फायदा होगा. पर ज्यादातर अभिभावक कॉमिक्स को समय, पैसे, आदि की बर्बादी समझते है. जैसा की वो अब तक सुनते आ रहे है. उन्होंने कभी कॉमिक्स को खुद नहीं परखा जो सुन लिया वो मान बैठे. ये बहस तो लम्बी है की कॉमिक्स को सिर्फ बच्चो के लिए क्यों समझा जाता है पर यहाँ मै आप सबका ध्यान कॉमिक्स से होने वाले एक बड़े फायदे की ओर करना चाहता हूँ. विकसित होते और निरंतर कुछ न कुछ सीखते मस्तिक्ष को कॉमिक्स किस तरह विकास मे मदद करती है.


कॉमिक्स एकलौता ऐसा multimedia का साधन है जिसमे लगभग हर कोई आराम से अपनी सुविधा अनुसार चित्रों और कहानी को relate कर सकता है और उनमे हो रहे frame wise changes को समझ सकता है. ये खासियत बच्चो के दिमाग के विकास मे मदद करती है. क्या और किसी मनोरंजन के साधन मे है ये खूबी? अभिभावक अगर कॉमिक्स का सही तरीके और सोच से इस्तेमाल करें तो उनके बच्चो का बहुत बढ़िया विकास हो सकता है. साथ ही उनकी creativity और logical approach भी विकसित होता है. बस कॉमिक्स चुनते वक्त उसके मैटर पर एक बार उपरी नज़र डाल कर उसे देख लें. कुछ बढ़िया कॉमिक सीरीज़ आपके बच्चे को बहुत अच्छी सीख दे सकती है. यहाँ भी मै कहूँगा की अपने हिसाब से खुद कॉमिक्स चुनिये...हर बार की तरह सिर्फ दूसरो की मत सुनिये. कई अभिभावक और आलोचक शिकायत करते है की कुछ कॉमिक्स मे व्यसक दृश्य, बातें, खून-खराबा बहुत होता है. मेरा कहना ये है की सारी कॉमिक्स ऐसी नहीं होती, मनोरंजन के बाकी साधन जैसे टी.वी., इंटरनेट, पत्रिकाएँ यहाँ तक की अख़बार आदि भी इस मामले मे कॉमिक्स से कहीं ज्यादा आगे निकल गये है.....और कम से कम कॉमिक्स मे अंत मे अच्छाई की बुराई पर जीत तो होती है.....है ना?

अब तक तो हाल ये है की साहित्यिक गलियारों मे बच्चो की चीज़ कहकर नकार दी जाने वाली कॉमिक्स को बाल साहित्य की श्रेणी तक मे जगह नहीं मिलती. तो क्यों ना नयी पीढ़ी से एक नयी शुरुआत की जाये जहाँ कॉमिक्स को भी साहित्य जैसा सम्मान मिले (क्योकि कॉमिक्स के पीछे भी कई प्रतिभाएं दिन-रात मेहनत करती है).