
कॉमिक्स काफ़ी सारी विविधता और किरदारों के साथ आती है. साथ ही कॉमिक्स का सबसे बड़ा फायदा किसी बच्चे (खासकर slow learners or differently abled) के विकास मे होता है. सिर्फ बच्चे ही क्यों बड़ो को भी समान रूप से कॉमिक्स पढने का फायदा होगा. पर ज्यादातर अभिभावक कॉमिक्स को समय, पैसे, आदि की बर्बादी समझते है. जैसा की वो अब तक सुनते आ रहे है. उन्होंने कभी कॉमिक्स को खुद नहीं परखा जो सुन लिया वो मान बैठे. ये बहस तो लम्बी है की कॉमिक्स को सिर्फ बच्चो के लिए क्यों समझा जाता है पर यहाँ मै आप सबका ध्यान कॉमिक्स से होने वाले एक बड़े फायदे की ओर करना चाहता हूँ. विकसित होते और निरंतर कुछ न कुछ सीखते मस्तिक्ष को कॉमिक्स किस तरह विकास मे मदद करती है.
कॉमिक्स एकलौता ऐसा multimedia का साधन है जिसमे लगभग हर कोई आराम से अपनी सुविधा अनुसार चित्रों और कहानी को relate कर सकता है और उनमे हो रहे frame wise changes को समझ सकता है. ये खासियत बच्चो के दिमाग के विकास मे मदद करती है. क्या और किसी मनोरंजन के साधन मे है ये खूबी? अभिभावक अगर कॉमिक्स का सही तरीके और सोच से इस्तेमाल करें तो उनके बच्चो का बहुत बढ़िया विकास हो सकता है. साथ ही उनकी creativity और logical approach भी विकसित होता है. बस कॉमिक्स चुनते वक्त उसके मैटर पर एक बार उपरी नज़र डाल कर उसे देख लें. कुछ बढ़िया कॉमिक सीरीज़ आपके बच्चे को बहुत अच्छी सीख दे सकती है. यहाँ भी मै कहूँगा की अपने हिसाब से खुद कॉमिक्स चुनिये...हर बार की तरह सिर्फ दूसरो की मत सुनिये. कई अभिभावक और आलोचक शिकायत करते है की कुछ कॉमिक्स मे व्यसक दृश्य, बातें, खून-खराबा बहुत होता है. मेरा कहना ये है की सारी कॉमिक्स ऐसी नहीं होती, मनोरंजन के बाकी साधन जैसे टी.वी., इंटरनेट, पत्रिकाएँ यहाँ तक की अख़बार आदि भी इस मामले मे कॉमिक्स से कहीं ज्यादा आगे निकल गये है.....और कम से कम कॉमिक्स मे अंत मे अच्छाई की बुराई पर जीत तो होती है.....है ना?
अब तक तो हाल ये है की साहित्यिक गलियारों मे बच्चो की चीज़ कहकर नकार दी जाने वाली कॉमिक्स को बाल साहित्य की श्रेणी तक मे जगह नहीं मिलती. तो क्यों ना नयी पीढ़ी से एक नयी शुरुआत की जाये जहाँ कॉमिक्स को भी साहित्य जैसा सम्मान मिले (क्योकि कॉमिक्स के पीछे भी कई प्रतिभाएं दिन-रात मेहनत करती है).
8 comments:
अच्छी पोस्ट लिखी है आपने. कामिक्स के बारे में एक विचारधारा है कि ये कल्पनाशक्ति को विकसित नहीं होने देते और कुछ मामलों में उसे कुंद भी करते हैं. दूसरे, आमतौर से लेखक व चित्रकार दो अलग तरह के लोग हैं, अलग विधाओं से संबद्ध.
लेखक पहले से ही बहुत क्रियाशील रहे हैं जबकि चित्रकार प्रकाशन के लिए मंहगे होते हैं. दोनों की संख्या में भी ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है इसलिए दोनों में कुछ-कुछ अगाड़ी-पिछाड़ी भी होना ही है...ऐसी ही और भी बहुत सी बातें हैं इस संदर्भ में...
mohit ji, main aapki baat ka shat -pratishat samarthan karti hun.comics jaisi baal-patrika ham bade va bachche sabhi bahut chav se padhte hain . hamare ghar par aaj bhi chapak ,nandan aur koi bhi baal comics ho hindi ya angreji sabhi patrikayen aati hain.isase bachchko bahut kuchh seekhne ko milta hai.
poonam
बहुत अच्छी पोस्ट
आभार
हर पीढ़ी के अभिभावकों के अपने पूर्वाग्रह होते हैं. कभी फिल्मों पर रोक थी, कभी कॉमिक्स पर, कभी अकेले घूमने पर, कभी बाहर खाने पर, कभी खेलकूद पर, कभी गैर अकादमिक गतिविधियों परकभी लड़कियों के गाड़ी चलने पर. सोच बदलते बदलते बदलती है. और फिर नए ज़माने में हम सुनते हैं की फलां चीज़ पर कभी पाबन्दी थी तो विश्वास नहीं होता.
आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ,अच्छी रचना , बधाई ......
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Bachpan ki yaade taaza ho gayi meri...
Thanks
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अच्छी पोस्ट लिखी है आपने
bahut badhiya hai mohit bhaiya .. ek dum satik bat likhi hai apne
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