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Friday, March 30, 2018

मैं हैरान था, गिज्मो डक जस्टिस लीग में क्यों नहीं?

शुरुवात करते हैं राज कामिक्स से.. निःसंदेह नागराज और ध्रुव सालों से राज कामिक्स का चेहरा रहे हैं. उसके बाकी चर्चित किरदार, जैसे डोगा परमाणु भोकाल उस चेहरे के पीछे छिपे रहते हैं. अब मसला जब भी नागराज और ध्रुव के बीच अटकता है तो सामान्तः ध्रुव नागराज पर भारी पड़ता है, मगर अगर मसला किसी खलनायक के विरुद्ध जाता है तो लगभग हर जगह नागराज ही नागराज छाया रहता है.. इन बातों से शुरुवात करने का कारण आपको आखिर में मिलेगा.

अब आते हैं जस्टिस लीग पर. हमारी पीढ़ी के वे लोग जो कार्टून के दीवाने रहे हैं वो अब भी उन दिनों को कभी ना कभी जरुर याद करते हैं जब शाम ढले DD Metro पर कार्टून्स आते थे और हम सभी बेसब्री से अपने फेवरेट कार्टून का इन्तजार किया करते थे.. चंद मेरे जैसे लोग भी थे जो लगभग हर कार्टून उतनी ही श्रद्धा से देखते थे.. चाहे बैटमैन हो या सुपरमैन या जस्टिस लीग या ममीज अलाइव या स्पाइडरमैन या एक्समैन या फिर कोई और? और हमारे लिए जस्टिस लीग का मतलब वे किरदार हुआ करते थे जिन्होंने इसकी शुरुवात की थी.. सुपरमैन, बैटमैन, वंडर वुमन, हॉक गर्ल, मार्सियन, फ्लैश और ग्रीन लैटर्न. क्या मैंने साईबोर्ग या एक्वामैन का नाम लिया? नहीं ना! क्यों नहीं लिया? क्योंकि वे इसके पार्ट थे ही नहीं..मैंने इनकी शुरुवाती कामिक्स नहीं पढ़ी, क्योंकि उस समय उन कामिक्स तक पहुँच भी नहीं थी और जो गर पहुंच होती भी तो मेरी जेब की पहुंच से बाहर होती.. मेरी समझ कार्टून देख कर ही बनी.. एक्वामैन का जिक्र जस्टिस लीग कार्टून के चौथे और पांचवे एपिसोड में हुई और वह आगे भी समय-समय पर दिखता रहा, मगर उसे जस्टिस लीग का पार्ट नहीं कह सकते हैं.. और बात साईबोर्ग की तो वह पहले सीजन के ख़त्म होने के बाद कभी दिखा होगा(जी हाँ, दुसरे सीजन से इतने सारे सुपरहीरो का जमघट लगा की तीन-चार किरदार को छोड़ और कोई याद ही नहीं। जैसे ग्रीन एरो, ब्लैक कैनरी, सजाम, इत्यादि).. वह भी तब जब हॉक गर्ल इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दी(क्यों, वह एक अलग कहानी है, फिर कभी).
सिनेमा में बैटमैन ने इस लीग की शुरुवात की, जबकि कार्टून में बैटमैन इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था, क्योंकि बैटमैन ऑलवेज वर्क्स अलोन!

जब कुछ भी दिखाना था तो अपने अंकल स्क्रूच का गिज्मो डक क्या बुरा था, उसे भी हिस्सा बना ही लेते. वह तो फ्लैश से भी बेहतर कामेडी कर लेता है!

सिनेमा में सब कुछ सलीके से चल रहा था, मगर सिर्फ तब तक जब तक की सुपरमैन कि इंट्री नहीं हुई..मैंने किसी कामिक्स या कार्टून में सुपरमैन को यह कहते सुना हूँ की उसे किसी से हारने का डर है तो वह वंडर वुमन और मार्सियन से है. मगर सिनेमा में वंडर वुमन उसके सामने कुछ भी नहीं..कार्टून के किसी एपिसोड में फ्लैश को इतनी तेज गति से भागते हुए लेक्स को हराते देखा है कि डाइमेंशन का फर्क भी ख़त्म होने लगता है, मगर यहाँ सुपरमैन उसकी गति से भी तेज निकला.. बैटमैन को पता है की सुपरमैन क्रिप्टोनियन या फिर बिजली के तेज झटके या जादू के सामने बेबस है, लेकिन वह बिना तैयारी के उससे भिड जाता है.. यार मजाक बना कर रख दिया है बाकि सुपरहीरो का..(मैं साईबोर्ग और एक्वामैन का जिक्र भी जरुरी नहीं समझता)..

एक अच्छे भले सिनेमा का यह हाल कर डाला इन्होने.. मैं DC के किरदार को दिल से पसंद करता हूँ, मगर सिनेमा मुझे मार्वल का पसंद है.. वजह बताने की जरुरत अभी भी है क्या?

PS - हाँ हाँ, मुझे पता है इसे रिलीज हुए महीनों गुजर चुके हैं। मगर मैंने तो हाल ही में देखा है ना!

Tuesday, November 15, 2016

कलाकार श्री सुरेश डिगवाल

मेरे एक कलाकार-ग्राफ़िक डिज़ाइनर मित्र ने मुझसे शिकायत भरे लहज़े में कहा कि मैं अक्सर भारतीय कॉमिक्स कलाकारों, लेखकों के बारे में कम्युनिटीज़, ब्लॉग्स पर चर्चा करता रहता हूँ पर मैंने कभी सुरेश डिगवाल जी का नाम नहीं लिया। मैंने ही क्या अन्य कहीं भी उसने उनका नाम ना के बरारबर ही देखा होगा। वैसे बात में दम था, अगर एक-दो सीजन का मौसमी कलाकार-लेखक होता तो और बात थी पर सुरेश जी ने डोगा, परमाणु, एंथोनी जैसे किरदारों पर काफी समय तक काम किया। उसके बाद भी कैंपफायर ग्राफ़िक नोवेल्स, पेंगुइन रैंडम हाउस, अन्य कॉमिक्स, बच्चो की किताबों और विडियो गेम्स में उनका काम आता रहा। अब सुरेश जी गुड़गांव में जेनपैक्ट कंपनी में एक कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे हैं।
जहाँ तक उनपर होने वाली इतनी कम चर्चा की बात है उसपर मेरी एक अलग थ्योरी है। जिसको तुलनात्मक स्मृति थ्योरी कहा जा सकता है। किसी एक समय में एक क्षेत्र में जनता ज़्यादा से ज़्यादा 4 नाम ही याद रख पाती है (बल्कि कई लोगो को सिर्फ इक्का-दुक्का नाम याद रहते हैं)। उन नामो के अलावा उस क्षेत्र में सक्रीय सभी लोग या तो लम्बे समय तक सक्रीय रहें या फिर उन नामो को नीचे धकेल कर उनकी जगह लें। भाग्य और अन्य कारको से अक्सर कई प्रतिभावान लोग उस स्थान पर नहीं आ पाते जिसके वह हक़दार होते हैं, ओलंपिक्स की तरह दशमलव अंको से छठवे, सातवे स्थान या और नीचे स्थान पर रह जाते है जहाँ आम जनता स्मृति पहुँच नहीं पाती। सुरेश जी का दुर्भाग्य रहा कि एक समय वह इतना सक्रीय रहते हुए भी प्रशंसको के मन में बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए। 
उनकी इंकिंग, कलरिंग जोड़ियों पर टिप्पणी नहीं करूँगा पर मुझे उनकी शैली पसंद थी। मुझे लगता है अगर वह कुछ और प्रयोग करते, कुछ भाग्य का साथ मिल जाता तो आज मुझे अलग से उनका नाम याद ना करवाना पड़ता। एक वजह यह है कि बहुत से कलाकारों को अपना प्रोमोशन करना अच्छा नहीं लगता, इन्टरनेट-सोशल मीडिया की दुनिया से दूरी बनाकर वो अपनी कला में तल्लीन रहते हैं। खैर, कॉमिक्स के बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया है जहाँ सुरेश डिगवाल जी कला निर्देशन, एनिमेशन, चित्रांकन, विडियो गेम्स, ग्राफ़िक डिजाईन और शिक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं। आशा है आगे हम सबको उनका काम निरंतर देखने को मिलता रहेगा।
अधिक जानकारी के लिए इन्टरनेट पर सुरेश जी की ये मुख्य प्रोफाइल्स और पोर्टफोलियो हैं -

- ज़हन

Sunday, November 22, 2015

नागराज जन्मोत्सव 2015

Pic Credit - Mr. Vishi Sinha

नागराज जन्मोत्सव 2015 का हिस्सा बना, बुराड़ी, दिल्ली में राज कॉमिक्स के बंद हो चुके एनिमेशन स्टूडियो Rtoonz जो अब पाम गार्डन्स में परिवर्तित हो गया है, वहां के प्रांगण में 15 नवंबर 2015 को राज कॉमिक्स द्वारा भव्य आयोजन किया गया। सजावट, तैयारियां बहुत अच्छी थी पर शायद दिवाली के बाद होने के कारण आने वाले फैंस और कलाकारों, लेखकों की संख्या अपेक्षा से काफी कम रही। पर इसका फायदा यह रहा कि कई कलाकारों, प्रशंषको से तस्सल्ली से बात करने का अवसर मिला जो वैसे अधिक भीड़ में नहीं हो पाता। हनीफ अज़हर जी, हरविंदर मांकड़ जी, फैसल मोहम्मद भाई, अंसार अख्तर जी इनमे प्रमुख थे। बाकी राज कॉमिक्स से जुड़े क्रिएटिव्स संजय जी, मनीष जी, अनुपम जी, हेमंत जी, आदिल जी, ललित शर्मा जी, ललित सिंह जी, मंदार भाई, शादाब भाई, क्षितीश जी आदि सम्मानित सदस्य थे ही।

Vinod Kumar ji
मुझे इवेंट में आने में थोड़ा झिझक थी क्योकि बीच में काफी वज़न बढ़ गया है मेरी लापरवाही से और जो पहली छवि थी मेरी उसको बदलना नहीं चाहता था पर फिर कई मित्रों को आने की बात कह चुका था खासकर देवेन जी को जो ख़ास मुंबई से आ रहे थे यहाँ तो मैंने सोचा कि कहीं जन्मोत्सव के बाद ये सब मुझे पीटने ना आ जाएँ इसलिए मैं भी आ गया। अमित अल्बर्ट और हुसैन ज़ामिन जी से नहीं मिल पाने का मलाल रहा। स्टेज पर हो रहे मनोरंजन के साथ-साथ आर सी फ़ोरम्स से लेकर इंडियन कॉमिक्स गैलेक्सी के नए-पुराने मित्रों से बातों का दौर चलता रहा। फिर रात को रूककर विशाल, देवेन भाई, मैड्डी, नरेंद्र भाई, शादाब भाई, जॉन रॉक और इंडियन कॉमिक्स गैलेक्सी के सदस्यों से गप्पे चले। अगली सुबह पहले से काफी बदल चुके राज कॉमिक्स परिसर का भ्रमण किया, पहली बार आये मित्रों ने ऑफिस का अवलोकन किया, बस फिर बुरारी पार कर अगली बार मिलने की बात कर सबसे विदा ली। ओवरआल एक और यादगार इवेंट! 
smile emoticon
अब 29 नवम्बर को दिल्ली में ही अगले इवेंट कॉमिक फैन फेस्ट का इंतज़ार है।
- मोहित शर्मा (ज़हन)

Monday, November 25, 2013

कॉमिक्स फेस्ट इंडिया 2013




पहले कॉमिक्स फेस्ट इंडिया का आयोजन को दिल्ली में होने जा रहा है। पिछले वर्ष तक राज कॉमिक्स में "नागराज जन्मोत्सव" नाम से प्रख्यात आयोजन को इस बार और बड़ा रूप दिया गया है जिसमे देश भर से हिंदी-अंग्रेजी के कई विख्यात कॉमिक्स एवम बाल साहित्य के प्रकाशक हिस्सा ले रहे है। साथ ही नामी कलाकार और लेखक इवेंट में शिरकत करेंगे। 30 नवंबर और 1 दिसंबर चलने वाले इवेंट के मुख्य आकर्षण है। 




*) - राज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स, कैंपफायर-कल्याणी प्रकाशन, फेनिल कॉमिक्स, होली काऊ एंटरटेनमेंट,  पुस्तक महल, लोट-पोट, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि बहुत से प्रकाशनों का एक जगह जमावड़ा।

*) - कॉमिक्स, एनिमेशन से जुडी बड़ी हस्तियों उपस्थिति और वर्कशॉपस, सेमिनार्स। हर दिल अज़ीज़ अभिनेता श्री मुकेश खन्ना जी कि इवेंट मे शिरकत। 

*) - मशहूर जादूगर खरबंदा बंधुओ का मैजिक-मिरैकल शो। 

*) - प्रकाशको द्वारा आयोजन के लिए तैयार ख़ास कॉमिक्स, किताबें, कलेक्टर्स एडिशन वस्तुएँ।

*) - कलाकारों को सम्मान देने के लिए विभिन्न कैटगिरीज़ जैसे चित्रांकन, पटकथा, वेबकॉमिक, इंकिंग, रंगसज्जा आदि में कल्पना लोक अवार्ड्स। 

*) - अभिनेता श्री शिवा जी आर्यन के प्ले, स्किट्स एवम स्टेज परफॉरमेंस। 

*) - शाम को श्री रजत मिश्रा और बैंड का एक रॉक शो कॉन्सर्ट। 

*) - पश्चिम बंगाल के मूर्तिकार श्री मिहिर वैद द्वारा रचित आदमकद मूर्तियाँ ।  

*) - मनोरंजन के लिए करैक्टर डॉल्स, विशालकाय डोगा झूला आदि।  

*) - कॉमिक क्विज, रचनात्मक लेखन, कॉसप्ले, मिमीक्री, ऑनलाइन  आदि बहुत सी प्रतियोगिताएँ। 

*) - सुपर कमांडो ध्रुव पर आधारित गेम का प्रीव्यू।

*) - साथ ही कॉमिक्स, एनिमेशन से जुड़े बहुत से आयोजन।

तो दिल्ली हाट में इस ऐतिहासिक आयोजन का हिस्सा बनकर भारत में दोबारा जाग रहे कॉमिक्स कल्चर को बढ़ावा दें, और उन सैंकडो मेहनती-प्रतिभावान कलाकारो, प्रकाशको को इन दो दिन बस अपनी उपस्थिति से प्रोत्साहित करें।  

सेलिब्रेटिंग कॉमिक्स!








*एंट्री का कोई चार्ज नहीं है और वेबसाइट पर  रेजिस्ट्रशन करने पर आप पा सकते है आकर्षक गिफ्ट्स, बाहर से आने वाले फैंस के लिए रुकने कि व्यवस्था भी है। 

आपके इंतज़ार में....


*आर्यन क्रिएशनज़ के कलाकारो द्वारा कॉमिक्स फेस्ट के प्रोमोशन में बनायीं गयी स्ट्रिप, इसमें आप अप्रकाशित बाली और धुरंदर पाण्डेय के बाल रूप को देख सकते है. 

Sunday, September 8, 2013

निगेटिव्स - परचेजिंग रिव्यू

निगेटिव्स हाथ में आया. ठीक तीस अगस्त को मैंने ऑर्डर किया राज-कामिक्स के वेब साईट से. अभी तक के अच्छे अनुभव रहे हैं राज-कामिक्स के साईट से ऑर्डर करने के, मगर वह अनुभव ही क्या जिसमें खराब कुछ भी ना हो? सो इस बार ख़राब अनुभव मिलकर अनुभव का चक्र पूरा कर दिया राज कामिक्स ने. सिलसिलेवार ढंग से बताता हूँ.

1. तीस अगस्त को ऑर्डर किया, वह भी सबसे महंगे वाले कूरियर सर्विस से. मगर कामिक्स मिली पूरे आठ दिन बाद. शिकायत इस बात की नहीं कि आठ दिन बाद मिली. देरी किसी भी कारण से हो सकती है, सो इस मुआमले में छूट दे दी मैंने. शिकायत तो इस बात की ठहरी की मैं लगातार दो-तीन दिन से इन्हें मेल और फोन के जरिये संपर्क करना चाहा मगर इनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया.

2. कामिक्स की बात आगे के नंबरों में, फिलहाल तो अनुपम सिन्हा जी, मनीष गुप्ता जी और संजय गुप्ता जी द्वारा हस्ताक्षरित पन्ने को देख दिल खुश हो गया. मुझे पता है की उन्होंने कई कामिक्स पर बिलकुल यही शब्द अंकित किये होंगे, मगर लिखने के तरीके से यह नहीं लग रहा था की यह बस यूँ ही लिख दिया गया हो. अपनापन झलक रहा था उन शब्दों से... शुभकामनाएं...सप्रेम...आपका... मगर वहीं "युगांधर" कामिक्स पर संजय गुप्ता जी और मनीष गुप्ता जी के हस्ताक्षर देख ऐसा लगा जैसे मात्र खानापूर्ति की गई हो. खैर, उनकी भी अपनी कोई वजह और व्यस्तता रही होगी.

3. दफ़्तर से घर पहुंचा...कामिक्स हाथ में थी.. तो पहला काम "निगेटिव्स" को ही निपटाने का हुआ. पढ़ा, और सच कहूँ तो पढ़कर मजा नहीं आया. शायद मैंने बहुत अधिक अपेक्षा कर रहा था, जहाँ अधिक अपेक्षा रहती है वहीं हम निराश भी होते हैं. एक पल को तो लगा की शायद मैं अब रेणु, निर्मल वर्मा, एंगल, गैब्रियल मार्केज जैसे लेखकों को पढ़ते-पढ़ते कामिक्स का लुत्फ़ ही उठाना भूल गया था. मगर निगेटिव्स को पढने के बाद जब साथ आये अन्य ध्रुव के कामिक्स को पढ़ा तो लगा कि मैं अभी भी लुत्फ़ उठाता हूँ..मतलब यही की कहीं कुछ कमी थी. शायद मैं कम से कम "नागायण" के टक्कर की उम्मीद तो कर ही रहा था. दरअसल होता यह है की एक बार जब हम किसी भी कला के श्रेष्ठता को देख लेते हैं तो उम्मीदें भी वैसी ही हो जाती है. शायद उतनी अपेक्षा ना होती तो बेहतरीन लगती.

4. आखिर में ग्रीन पेज पढ़ते वक़्त अधिक मजा आया. अनुपम सिन्हा जी द्वारा लिखा गया ग्रीन पेज उनके बिलकुल दिल से निकालता सा लगा. इस कामिक्स के आदि से अंत तक बेहद विस्तार से बताया उन्होंने. क्या-क्या परेशानियाँ आई, और उससे उन्होंने कैसे पार पाया. एक साथ कैसे कई प्रोजेक्ट्स पर काम करते रहे. वगैरह-वगैरह बातों से यह साफ़ झलक रहा था की कितने जुझारू और अपने काम के प्रति कितने कर्तव्यनिष्ठ हैं वह.

5. आखिरी बात...अपने इस कामिक्स ब्लॉग के एक मोडरेटर आलोक शर्मा को ग्रीन पेज में देख उत्साह अपने चरम पर था...वाकई मजा आ गया उन्हें ग्रीन पेज पर देख कर.. :-)

रेटिंग : **** आऊट ऑफ़ फाईव.

आप सोच रहे होंगे की इतनी आलोचना के बाद भी चार रेटिंग कैसे? तो दोस्तों वह इसलिए क्योंकि कामिक्स वाकई शानदार है. चाहे पेज क्वालिटी हो या कहानी या चित्रांकन. बस मुझे उतना पसंद इसलिए नहीं आया क्योंकि मैं बहुत अपेक्षा रख रहा था. आखिर इतने सालों से अनुपम सिन्हा जी इस पर काम कर रहे हैं तो मेहनत रंग क्यों ना लाएगी?

Saturday, July 27, 2013

नेगेटिव्स

राज कामिक्स के बहुचर्चित कामिक्स सीरिज "नागायण" के बाद अब फिर से एक आगामी कामिक्स बेहद चर्चे में है, जिसका नाम है "नेगेटिव्स". इस कामिक्स के लेखक "अनुपम सिन्हा" जी का मंतव्य आपके सामने रख रहा हूँ जो वे अक्सर फेसबुक पर अपने दोस्तों से आजकल बांच रहे हैं. इसे उन्होंने तीन भाग में बेहद रोचक अंदाज में लिखा है. मैं सिर्फ यहाँ कॉपी-पेस्ट से काम चला रहा हूँ. फिलहाल तो मुझे इस मल्टीस्टारर विशेषांक का इन्तजार है.


भाग एक :

नागायण...और फिर नेगेटिव्स! ये 'न' से शुरू होने वाली कॉमिक्स काफी फैल कर बैठना पसंद करती हैं। ये जो चित्र साथ में अपलोडेड हैं ये पोस्ट की खूबसूरती बढाने के लिए नहीं है। इसमें एक ख़ास बात है। ...तो 'अवशेष' सीरीज के बाद हम लोग एक नए शाहकार की तलाश में थे। ये आईडिया संजय गुप्ता जी का था कि इस बार 10,000 के बजाए 1 लाख वाली लड़ी छुटाई जाए। 55 पेजों के तीन कॉमिक की सीरीज बनाने के बजाए क्यों न एक ही 160 पृष्ठों क़ी कॉमिक बनाई जाए। संजय जी का तो आग्रह ही मेरे लिए आदेश होता है, और आईडिया तो नवीनता से परिपूर्ण था ही, इसीलिए मैंने भी लम्बी सांस बाद में ली और हाँ पहले किया। न कांसेप्ट था उस वक़्त तक, न कांसेप्ट का अता-पता! नाम का तो पूछो ही मत! बस ये तय था कि कॉमिक मल्टी-स्टारर होगी। नागराज, ध्रुव और डोगा के साथ और कौन से ब्रह्माण्ड-रक्षक होंगे, इसका जिम्मा भी मेरे कन्धों पर डाल दिया संजय जी ने! फिर भी मैंने उनकी व्यक्तिगत पसंद जानने को जोर डाला तो उन्होंने कहा कि हो सके तो तिरंगा को इसमें शामिल कर लें। तो तिरंगा शामिल हो गया....और क्या शामिल हुआ!!
भाग दो :
तिरंगा तो नेगेटिव्स में शामिल हो गया था पर दूसरे हीरोज को चुनना अभी बाकी था | कल किसी ने ज़िक्र किया था कि संजय जी अगर बांकेलाल का नाम लेते तो ? तो ये विचार मुझे आया था और संजय जी ने कहा था कि जैसा ठीक समझें, कर लें | परन्तु बांकेलाल का समय-काल काफी दिक्क़तें पेश कर रहा था | काफी सोचा, पर बांकेलाल की गडबड करने की प्रवृत्ति इस कहानी तक को प्रभावित कर रही थी | हार कर मैंने बांकेलाल जी को हाथ जोड़ लिए कि आप को किसी और कॉमिक में पूजूँगा | आखिरकार ब्रह्माण्ड-रक्षकों की लाइन तय हो गयी कि इसमें नागराज, ध्रुव, डोगा, परमाणु और, ज़ाहिर है, तिरंगा शिरकत करेंगे | तो ईटें, सीमेंट आ चुकी थीं पर मकान का नक्शा और प्लाट यानि भूखंड का अता-पता तक नहीं था | दरअसल 160 पेजों की एक कहानी लिखने और 55-55 पेजों के तीन खंड की कहानी लिखने में थोड़ा फर्क होता है | ज़ाहिर है कि 160 पेजों की कहानी एक बार में पढी जाएगी तो उसमे फ्लो यानि सततता का होना अति-आवश्यक है | साथ ही विलेन कोई नया और महाशक्तिशाली होना चाहिए ताकि कॉमिक में इतने दिग्गजों की उपस्थिति को उचित ठहराया जा सके | उस विलेन का उद्देश्य भी दुनिया को हिला देने वाला होना चाहिए | अबतक मैं ब्रह्माण्ड-रक्षकों की हर कॉमिक में यही सोच अपनाता आया हूँ, पर 160 पेजों तक आपको बिना रस्सी के कुर्सी या बेड से बाँधे रखने के लिए रोमांच की मजबूत डोर तो चाहिए न? जो आईडिया सोचो तो लगता था की अरे, ये तो हम यूज कर चुके, ...ओह, ये तो उस कॉमिक से मिलता-जुलता आईडिया है! बिना 100% आश्वस्त हुए मैं कोई कॉमिक शुरू नहीं करता चाहे संजय जी कितना ही डाट लें! पर वो आईडिया आएगा कहाँ से जो 160 पेजों की महागाथा की गरिमा के अनुरूप हो? मेरे दिमाग में काम करते वक्त जो भी आईडिया आता है उसको मैं या तो लिख लेता हूँ, या उसका रफ स्केच बना लेता हूँ या अगर बहुत खुश हो गया तो फाईनल ड्राईग बना कर भी रख लेता हूँ | ये मेरा आईडिया-बैंक है और जब मैं सब तरफ से हार जाता हूँ तो इसी की शरण लेता हूँ ! मैंने जब अपने आईडिया-बैंक को खंगालना शुरू किया तो पहले तो कुछ खास नहीं मिला , लेकिन फिर मिला एक चित्र ! जब मैंने इसका फाईनल स्केच बनाया था तो इसके लायक कोई कहानी मेरे दिमाग में नहीं थी | पर अब ये मेरी सोच पर ऐसा फिट बैठ रहा था जैसे कि पैरों में मोजा! इस चित्र को देखते ही पूरा प्लाट अपने आप दिमाग में खटाखट बैठने लगा! जिस काम के लिए हफ्ते लगा दिए थे वो मिनटों में हो गया ! चित्र यही वाला था जो मैंने आप के अवलोकन के लिए लगाया है | पर इसमें रहस्य क्या है? रहस्य तो Sanjay जी भी आज आप लोगों के साथ ही जानेंगे ! अभी तक मैंने उनको भी नहीं बताया है कि ये टाइटल/एड डिज़ाइन मैंने 2008 के पूर्वार्ध में बना कर छोडा हुआ था ! तब से ये 160 पृष्ठों की नेगेटिव्स बनने की राह देख रहा था! तो सब तैयार था लेकिन अभी तो पहाड़ को सिर्फ चुना गया था | उस पर चढने की शुरुआत अभी होनी थी | और यकीन मानिए, अगर पहले से पता हो कि 160 ऊंची-ऊंची सीढियां एक सांस में चढनी हैं तो सांस पहले से ही फूलने लग जाती है ! पर आप सब के लिए ये पहाड़ तो मुझे चढना ही था!
भाग तीन :
लोग कहते हैं की हर कहानी की एक आत्मा होती है! मैं मानता हूँ | पर हर कहानी की एक जन्मपत्री भी होती है और उस जन्मपत्री में ग्रहों यानि पात्रों को उनके घरों में यानि स्थितियों में सही जगह पर बैठाना होता है | तभी उनका सही भाग्यफल दृष्टिगोचर होता है | ये जन्मपत्री कहानी शुरू करने से पहले बनानी ज़रूरी है, खासकर के तब, जब आप किसी बड़ी कहानी पर हाथ आजमा रहे हों | नेगेटिव्स जैसी कहानी ! तिरंगा को मैंने बहुत दिनों से हैंडल नहीं किया था | उसको इस कहानी में एक महत्त्वपूर्ण रोल देना एक चुनौती थी |अभी किसी ने पिछली पोस्ट पर (भाग २) ये कमेन्ट किया था कि कुछ मल्टी-स्टारर को छोड कर हर कॉमिक में, हीरोज की क्षमता के साथ अन्याय होता है | मैं इस बात से कतई इत्तेफाक नहीं रखता | मेरी कहानी में हीरोज को उनकी प्रसिद्धि के आधार पर नहीं बल्कि उस खास कॉमिक में उनके रोल के अनुसार जगह दी जाती है | और हर हीरो को वही काम दिया जाता है जिसे कि सिर्फ वो ही कर सके | नेगेटिव्स में डोगा का सीक्वेंस अगर नागराज पर फिट करने कि कोशिश की जाए तो नागराज बहुत ज्यादा ड्रामेटिक और विश्वास से परे लगेगा| मेरी हर मल्टी-स्टारर में किसी दूसरे हीरो को किसी और के रोल में फिट नहीं किया जा सकता | हर हीरो अपनी क्षमता के अनुरूप एक महत्वपूर्ण कार्य करता है | फिलहाल तो, नेगेटिव्स पर आगे चर्चा करते हैं | ग्रहों की यानि मुख्या पात्रों की जगह तय हो जाने के बाद बारी आती है नक्षत्रों की, यानि सहायक पात्रों की, जो समय समय में कहानी में आकर कहानी को गति और दिशा प्रदान करते हैं| इनका चुनाव सबसे मुश्किल कार्य होता है, क्योंकि ध्यान रखना पड़ता है की कहीं ये सहायक इतने महत्वपूर्ण न हो जाएँ कि मुख्य पात्रो पर हावी होने लगें | ये दरअसल वे छोटे छोटे सीक्वेंस करते हैं जो मुख्य पात्रों के सीक्वेंस को आपस में जोड़ते हैं | जब इनका चुनाव भी हो गया तो असली काम शुरू हुआ; कहानी की शुरुआत ! अभी सिर्फ इतना ही बता सकता हूँ कि कहानी शुरू करने का अवसर तिरंगा को दिया गया है | उसकी सोच और उसकी शक्तियों (?) को नवीनता दी गई है | वैसे किसी बहुत बड़े बदलाव कि अपेक्षा न करें , तिरंगा शत प्रतिशत वही है जैसा कि आप देखते आए हैं, बस उसके तेवर ज़रा बदले मिलेंगे आपको ! कहानी की शुरुआत एक जटिल निर्णय होता है | कई कहानियाँ तो सिर्फ इस कारण से लटकी पड़ी रहती हैं क्योंकि लेखक उसकी शुरुआत नहीं ढूंढ पाता | हम हर बार भाग्यशाली साबित हुए हैं और इस बार भी हुए! कहानी एक बार जो शुरू हो गई तो रूकती नहीं! बस कहीं कहीं पर अटकती ज़रूर है १ नेगेटिव्स भी अटकी लेकिन हमने हर बार जोर लगाकर गाडी पार लगा ही दी ! जब तक मैं कहानी से संतुष्ट नहीं होता तक तक मैं उसको आप तक नहीं पहुंचाता | क्योंकि मेरा मानना है कि मेरा दिमाग आप सब के दिमागों से जुड़ा हुआ है ; ‘कॉमिक-वेव्स’ की अदृश्य डोर से ! अगर मैं संतुष्ट नहीं तो आप भी नहीं होंगे! नेगेटिव्स लिखने और बनाने के बाद मैं महासंतुष्ट हूँ! बताना तो बहुत कुछ है पर हर बात ‘घर का भेदी’ साबित हो रही है ! रहस्यों को पहले से ही खोलने कि धमकी दे रही है ! तो और ज्यादा नहीं बताऊँगा | हिन्दुस्तान में कॉमिक्स ने कई दौर देखे हैं | सबसे सफल दौर 1990 से लेकर 2005 तक के वर्ष रहे हैं | आज भी आप में से कई पाठक उस दौर को आवाज़ लगाते रहते हैं | नेगेटिव्स वही दौर वापस ले कर आया है! कम से कम प्रयास तो यही है ! ! भरपूर कहानी, ठसाठस भरे धमाकेदार डाएलॉग्स और एक्शन से सराबोर चित्र ! लाइन-आर्ट में बने चित्रों में सिर्फ बुनियादी कलर-इफेक्ट ! बस, एक शिकायत मत करना, दोस्तों, कि 160 पृष्ठ कम पड गए! वैसे नेगेटिव्स पर एक अगला लेख भी लिखूंगा | जब आप सब इसे पढ़ लेंगे, उसके बाद! वह होगी नेगेटिव्स बनाने की पूरी यानि सम्पूर्ण कहानी ! अब आपके लेखो यानि रिव्यूज़ का इन्तज़ार रहेगा !

तो दोस्तों, इसका आखिरी अंक अनुपम जी द्वारा लिखते ही मैं इसे उस चौथे अंक के साथ अपडेट कर दूंगा. तब तक के लिए अलविदा |

Wednesday, January 19, 2011

उफ्फ़ ये डोगा का सिनेमा भी ना..


यह ना तो फिल्मी गॉसिप है और ना ही भारतीय कामिक्स प्रेमियों के लिए सनसनी.. यह तो मात्र एक ऐसे कामिक्स प्रेमी की व्यथा है जो भारतीय कामिक्स कैरेक्टर को सिल्वर स्क्रीन पर देखना चाहता है..

पिछले लगभग दो सालों से सुन रहा हूँ कि अनुराग कश्यप जी डोगा को सिल्वर स्क्रीन पर उतारना चाहते हैं.. जब मैंने यह पहली दफे सुना था तब मन में सबसे पहला सवाल यही उठा था की कौन सा भारतीय अभिनेता शारीरिक तौर से इतना फिट है, फिर पता चला कि कुनाल कपूर को इसके लिए चुना गया है और वह जीतोड मेहनत भी कर रहे हैं ऐसा उनके ही किसी Interview में पढ़ा भी.. कई अन्य सवालों में से एक प्रमुख सवाल मेरे मन में आया था, वह यह कि मोनिका का रोल कौन करेगी? क्या मुंबई के गटर के भीतर सच में इतनी जगह होती है क्या जिसमें से डोगा आराम से आ-जा सके? और यक़ीनन जब अनुराग कश्यप सिनेमा बनाएंगे तो सूरज और मोनिका को पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचते-गाते तो नहीं ही दिखाएँगे..

खैर यह सब भी होता ही रहेगा, और अनुराग जी पर इतना भरोसा तो जरूर है कि वह जब भी बनाएंगे तो वह एक क्लासिक चीज ही होगी.. मगर सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर दो साल से सुनते-सुनते अभी तक कहीं यह चर्चा क्यों नहीं सुना कि यह फ़िल्म बन रही है? हर जगह यही क्यों पढ़ने को मिलता है कि फ़िल्म बनेगी?

मैंने इस बाबत कुछ छानबीन की और पता चला कि अनुराग जी पूरे मन से इसे बनाने को तैयार हैं, मगर डोगा के कापीराईट को खरीदने के लिए पैसे को लेकर मामला अटक गया है.. और अभी गेंद राजा पाकेट बुक्स के पाले में है.. अब अंदर कि खबर क्या होगी यह तो अनुराग जी और संजय गुप्ता जी ही बताएँगे.. मगर मेरी समझ यही कहती है कि अगर इस पर सिनेमा बनती है और वह थोड़ी भी चर्चा पाती है तो इसका सीधा फायदा राजा पाकेट बुक्स को ही मिलेगा, क्योंकि मेरी जानकारी में राज कामिक्स(सनद रहे, राज कामिक्स राजा पाकेट बुक्स का ही एक हिस्सा है) का मुनाफा दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है, और अगर यह सिनेमा सिल्वर स्क्रीन पर आती है तो यह हित रहे या फ्लॉप मगर इसका सीधा फायदा डोगा की कामिक्स की बिक्री को होगा.. और यक़ीनन उसकी बिक्री पहले से अधिक भी होगी..

खैर, मैं भी आप पाठकों की ही तरह इन्तजार में हूँ कि कब हमें यह सिनेमा सिल्वर स्क्रीन पर देखने को मिलता है..


आज के इस पोस्ट के साथ मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर अब से इस ब्लॉग पर वैसा कोई भी कामिक्स आपको पढ़ने को नहीं मिलेगा जो फिलहाल बाजार में उपलब्ध है.. अभी जिस किसी पोस्ट में ऐसे लिंक उपलब्ध हैं उसके लिंक धीरे-धीरे Deactivate किया जा रहा है.. धन्यवाद..

Monday, July 5, 2010

रे संजय ताऊ! इधर भी देख लो! (Haryanvi Flavor)


भारतीय कॉमिक्स के सिमटते संसार से दुखी एक हरियाणा निवासी कॉमिक प्रशंषक की भारतीय कॉमिक्स के इक्का दुक्का बचे स्तंभों मे से एक राज कॉमिक्स के प्रमुख श्री संजय गुप्ता जी से काल्पनिक फ़रियाद. भाषा का मकसद किसी को आहत करना नहीं बल्कि सिर्फ मनोरंजन करना है.



"भई, म्हारा नाम जाट मोहित से! सब लोगन को म्हारा प्रणाम. मन्ने राज कॉमिक्स बड़ी चोखी लागये से. सारा गाँव दीदे काढ़े करे मारे पे फिर भी यो राज कॉमिक्स ना छोड़ के दी गयी. सारे कहवें की अच्छे चंगे जाट को तो कॉमिक्स ने खा गेरा. छोरियां कहवें से से की घना चीकना छोरा किंगे को डल्ले मार रिया है. पर मै अख्यन्न मे पंजे डाल के किसी की ना सुनु.....बस घनी बिमला सी विसर्पी के सपने बुनू सु. सब से कहूँ के घने दीदे मत ना काढो मै कौन सा पानी को पापा कह रिया हूँ....म्हारा तो यो ही फंडा है के "राज कॉमिक्स से म्हारा जनून".

इब बस संजय ताऊ से यो ही बिनती से के राज कॉमिक्स मे हरयाणवी बोली भी संग नु कल लो. यहाँ घने पंखे बैठे है संजय ताऊ जी और वा की कॉमिक्स के. रे अगर हरयाणवी मे राज कॉमिक्स आ जावे तो म्हारा तो घी सा गल जावे. और सारे ताऊ जियो को लग रिया हो के यो हरयाणवी मे छापने से चिडिया ना उड़न वाली तो झाग मत ना बिलोवो बस इतना सुन लो के थारी हिंदी कॉमिक्स मे थोडा 'हरयाणवी Flavor' भी पेल दिया करियो. इतता तो ढेडे के बीज भी कल लेंगे. मै किसी भासा का नास का ना फोड़ रहा मै तो यो ही चाहूँ के बंगाली, भोजपुरी, गुजराती, सिन्धी, तमिल, उर्दू, और निरे भारत की भासाओ का फ्लेवर राज कॉमिक्स अपनी कॉमिक्स मे देती रहवये. केवल "साडा की होऊ...., etc" की पीपणी ना बजाती फिरे. अच्छा तो जी.....अब इस blog पर ज्यादा थूक के पकोडे मत ना तारो.

नमस्कार!!"

Sunday, April 25, 2010

"खाकी और खद्दर" राजनीति का अपराधीकरण के बाद

मुझे राज कामिक्स कि सबसे बड़ी खूबी यह दिखती है कि अक्सर यह हमारे आस पास होने वाली ही किसी घटना को उठाकर कहानी का जाल बुनती है.. खासतौर से अगर डोगा या फिर इसके थ्रिल होरर कामिक्स कि बात करें तो आप यह जरूर पायेंगे.. जिस कारण से इसकी कहानियां अपने आस पास कि ही कोई कहानी कहती सी लगती है..

अभी कुछ दिन पहले मैंने Raj Comics पर एक होरर कामिक्स पढ़ी जिसका नाम था रोतडी.. इसमे हरियाणा और उसके आस पास के पंचायतो द्वारा ढाने वाले जुल्मो को लेकर कहानी आगे बढ़ाई गई थी और बाद में उसमे शन्नो चुड़ैल को जोड़ कर उस अन्याय के विरूद्ध खड़ा कर दिया गया था.. कुल मिलकर अगर कहूँ तो अक्सर यह महसूस होने लगता है कि काश असल जिंदगी में भी कोई डोगा या फिर अप्राकृतिक शक्ति आकर ऐसे ही हमें उन सामाजिक जुल्मो के विरोध में खड़ा होना सिखाए जो इन कामिक्स के नायक/नायिका करते हैं..

खैर, आज मैं यहाँ बताने आया हूँ खाकी और खद्दर के बारे में.. यह कामिक्स जिस समय आई थी उन दिनों गुजरात में हुए फर्जी एनकाउंटर को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ था.. पुलिस, मीडिया और राजनीतिज्ञ, सभी जगह सिर्फ वही मुद्दा छाया हुआ था.. इस कामिक्स कि शुरुवात भी होती है एक फर्जी एनकाउंटर से जो मुंबई के किसी हिस्से में हुई है और वह एक ऐसे पुलिस वाले कि करतूत थी जो अपने अन्डरवर्ल्ड के आकाओं को बचाने के लिए झूठी इन्फार्मेशन देकर वह फर्जी एनकाउंटर करवाता है.. बाद में जब वह पकड़ा जाता है तब वह राजनीति में घुस कर क़ानून को अपने इशारों पर नाचना शुरू कर देता है..

यह कामिक्स "शेर का बच्चा" का ही सिक्वेल है.. तो जाहिर सी बात है कि सूरज अब डोगा नहीं बनने कि राह पर निकल चुका है..(जानने के लिए पढ़े "शेर का बच्चा".. सूरज भी मोनिका और अन्य आम जनता कि तरह ही इस गुंडागर्दी का तमाशा देखना शुरू कर देता है.. सूरज फिर से डोगा क्यों और कैसे बना, यह आपको इस कामिक्स के जरिये जानने को मिलेगा..

अगर मेरी राय पूछे तो यह कामिक्स डायलोग और कहानी के नाम पर बेहद उम्दा है, हाँ मगर इसमे डोगा के एक्शन कि कमी जरूर खलेगी.. मेरी राय में इसकी रेटिंग चार है पांच में(****4/5)..

डाउनलोड लिंक - खाकी और खद्दर (भाग २)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..


डाउनलोड लिंक - शेर का बच्चा (भाग १)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..




डाउनलोड लिंक - खाकी और खद्दर (भाग २)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..


डाउनलोड लिंक - शेर का बच्चा (भाग १)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..


वैसे जब आप इस कामिक्स को डाउनलोड करके पढ़ना शुरू करेंगे तो पहले दो-तीन पृष्ठों पर पायेंगे कि मेरा नाम लिखा हुआ है, और कहीं "प्रशान्त डोगा" लिखा हुआ है.. असल में "शेर का बच्चा" और "खाकी और खद्दर" आने के बाद मैं डोगा का इतना बड़ा फैन हो गया था कि दीदी मुझे डोगा ही कह कर बुलाने लगी थी.. और वह हैंडराइटिंग भी मेरी दीदी कि ही है.. :)


Doga related posts and Doga's Comics for free download

Saturday, April 24, 2010

शेर का बच्चा सूरज

इस कहानी का सारा ताना बना बुना गया है सूरज, डोगा, मोनिका, चीता, अदरक चाचा और चंद समाज के बेहिसाब दौलत और ताकत रखने वाले भेड़ियों पर.. डोगा के कम ही कामिक्स में ऐसे गजब की चित्रकारी, डायलॉग, एक्शन, इमोशन और सिक्वेंस एक साथ देखने को मिलेगा.. कुल मिला कर अगर मुझे इस कामिक्स को रेटिंग देने को कहा जाए तो मैं इसे पांच में चार दूँगा(****4/5)..

अब तक सूरज(नए आने वालों के लिए - सूरज ही डोगा है) को पता चल चुका होता है कि उसकी सोनू जो बीहड़ के घने जंगलों से भागते समय नदी कि धारा में बह गई थी वह मोनिका ही है, मगर मोनिका को यह नहीं पता होता है कि सूरज ही डोगा है.. मोनिका डोगा से बेहिसाब नफ़रत करती होती है, क्योंकि उसके हिसाब से डोगा का तरीका सही नहीं है.. उसका यह भी मानना होता है कि अगर सभी डोगा कि ही राह अपना लें तो इस समाज का कोई नाम लेने वाला भी बचा नहीं रहेगा..

मोनिका का भाई चीता को इस बात इल्म हो चुका था कि सूरज ही डोगा है, मगर अभी तक वह भी यह समझ चुका था कि इस समाज को डोगा कि जरूरत है.. घटनाक्रम कुछ ऐसा मोड़ लेती है कि डोगा को भी पता चलता है कि चीता उसका राज जान चुका है, और वह किसी भी कीमत पर अपना राज जानने वाले को जिन्दा नहीं छोड़ सकता है.. इसी जूनून में वह अपनी बन्दूक कि सारी गोली चीता के सीने में उतार देता है और वह भी मोनिका के सामने ही.. बाद में मोनिका को भी पता चल जाता है सूरज ही वह डोगा है जिसने अभी अभी उसके भाई को गोली मारी है.. इसी बीच अदरक चाचा डोगा और चीता-मोनिका के सामने दीवार बन कर सामने आ जाते हैं..

कुल मिला कर इस जबदस्त कामिक्स को पढ़ना ना भूलें.. और कुछ नहीं तो मेरी बात पर भरोसा करें कि "यह कामिक्स जबरदस्त है"..

चलते चलते बताता चलूँ, कि यह मेरे द्वारा स्कैन करके नेट पर अपलोड की जाने वाली पहली कामिक्स थी.. जो डोगा कि नेट पर उपलब्ध पहली ई-कामिक्स भी थी.. :)

डाउनलोड लिंक : शेर का बच्चा
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..




डाउनलोड लिंक : शेर का बच्चा
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..



आगे आने वाले कामिक्स के नाम :
  • खाकी और खद्दर (डोगा)

  • खूनी खानदान (ध्रुव)

  • अतीत (ध्रुव)

  • जिग्सा (ध्रुव)


एक दफ़े ये सभी पोस्ट हो जाने के बाद नागराज के उन कामिक्स को कुरेदा जायेगा जो नागराज कि शुरुवाती कामिक्स थी और अब बाजार में भी उपलब्ध नहीं है.. :)

नागायण - वरणकांड

यह कामिक्स श्रृंखला मेरी नजर में राज कामिक्स का अभी तक के बिक्री का सारा रिकार्ड तोड़ डाले थे.. आज मैं इसके पहले भाग का प्रस्तावना जैसा ही कुछ ले कर आया हूँ, जिसमे इसके प्रमुख पात्रों का जिक्र है..

मैंने जब से ये ब्लॉग शुरू किया है तभी से अपने ही बनाये इस नियम को मानता चला आ रहा हूँ कि मैं कोई भी ऐसा कामिक्स का लिंक यहाँ ना दूँ जो पिछले दो वर्षों मे आया हो या फिर अभी भी उसकी खूब बिक्री हो रही हो.. मैं कुछ भी ऐसी सामग्री यहाँ नहीं डालना चाहता हूँ, जिससे कामिक्स इंडस्ट्री पर कुछ भी बुरा असर ना हो, जिससे भविष्य में और भी कामिक्स पढ़ने को मिले.. :) मगर फिर भी मुझे अफ़सोस के साथ कहना पर रहा है कि लगभग सभी नई-पुरानी कामिक्स इस अंतर्जाल पर कहीं ना कहीं बिखरे पड़े हैं..

फिलहाल तो आप इस कामिक्स के कुछ झलकियाँ देखें..

प्रमुख पृष्ठ :



नागराज :



ध्रुव :



नागपाशा :



नताशा :



विसर्पी :



बाबा गोरखनाथ :


Thursday, April 22, 2010

जब प्रतिशोध लेने कि बात करने वाला पिट गया, मेरा मतलब विलेन :)

सन 1996 कि बात है, उस जमाने में कामिक्स का नशा सर चढ़ कर बोला करता था(वैसे बोलता तो अभी भी वैसे ही है :D).. मगर घर में पापा-मम्मी कामिक्स के धुर-विरोधी हुआ करते थे.. मगर एक दिन "जैसे हर कुत्ते का एक दिन होता है" मेरा भी दिन आया, और पापा जी मुझे बोले कि "जाओ बच्चा तुम्हे सौ रूपये देता हूँ.. इसमें जितना कामिक्स खरीद सकते हो खरीद लो.." उनकी यह वाणी मुझे किसी आकाशवाणी से कम नहीं लगी.. ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में देवकी के ब्याह के समय कंस को आकाशवाणी सुनाई दिया था.. (वैसे कभी कभी सोचता हूँ कि महाभारत काल और उसके आस पास के काल मे इत्ते सारे आकाशवाणी क्यों लोगों को सुनाई देता था?? :o ;))

अब एक अंधे को क्या चैये, बस दो ऑंखें.. उस समय मैं बिक्रमगंज नामक शहर में रहता था, जो बिहार के रोहतास(सासाराम) जिले में अवस्थित है.. वहाँ राज कामिक्स मिलता नहीं था और मैं अपने अमूल्य सौ रूपये डायमंड कामिक्स के चाचा चौधरी जैसे कामिक्स पर खर्च करने को तैयार नहीं था.. अब विकट स्थिति जान पड़ी.. करें तो क्या करें.. बस संभाल कर रख लिया वह सौ रूपया, सोचा "केकयी" जैसे ही समय आने पर इसका उपयोग करूँगा और बेचारे पापा मना भी नहीं कर पायेंगे..

फिर वो दिन भी आया जब पापाजी को किसी मीटिंग में डेहरी-ऑन-सोन जाना था और साथ में हम भी लटक लिए.. पापाजी गए मीटिंग के अंदर और हम उनके बॉडीगार्ड साहब को लेकर पहुँच गए वहाँ के रेलवे स्टेशन.. ध्रुव या नागराज का कोई कामिक्स तो मिल ही जायेगा, इसी उम्मीद में.. और वहाँ से ख़रीदे तीन कामिक्स.. तीनो के तीनो ही ध्रुव के..
  • "स्वर्ग कि तबाही"

  • "दलदल" और

  • "ब्लैक कैट"


जिसमे से स्वर्ग कि तबाही ध्रुव कि एक दूसरी कामिक्स का आखरी भाग था, उसके पहले भाग का नाम आदमखोरों का स्वर्ग था.. इन दोनों कामिक्स को मैं पहले भी आपके सामने ला चुका हूँ जिसका लिंक उन कामिक्स के नाम के साथ दे रहा है मैंने.. Link Deleted on request of Sanjay Gupta Ji..

दूसरी कामिक्स "दलदल" अपने आप में पूरी कामिक्स थी.. आगे पीछे कोई भी रोवनहार नहीं था उस कामिक्स का, मतलब कोई दूसरा भाग नहीं था.. :)

और तीसरी कामिक्स "ब्लैक कैट" के साथ भारी पंगा हो गया.. लेते समय मैंने देखा नहीं और पढ़ने पर पता चला कि यह तो पहला भाग है.. अब दूसरा भाग कहाँ से आये.. भारी लोचा.. अब तो पटना आयें तो यहाँ पता करे उसके दूसरे भाग के बारे में.. डेहरी-ऑन सोन जाए तो फिर वही चक्कर.. पटना के पुस्तक मेला में भी मेरे घूमने कि वजह सिर्फ यही कामिक्स थी(उस जमाने में साहित्य भगोरों में मेरा नाम अव्वल हुआ करता था सो किसी साहित्यिक पुस्तक मैं खरीदने से रहा.. वैसे मेरा मानना है कि कामिक्स भी साहित्य के ही किसी श्रेणी का हिस्सा है :)).. "रोबो का प्रतिशोध" नाम था उसके दूसरे भाग का.. सबसे बड़ी मुसीबत तो यह कि पहले भाग में ध्रुव को बुरी तरह घायल दिखा दिया था.. मन में सवाल यह नहीं था कि वह बचा या नहीं, क्योंकि उसकी नई कामिक्स लगातार आ रही थी(ही ही ही :D).. सवाल यह था कि वह बचा तो कैसे बचा..

खैर एक दिन ब्रह्म देव मुझ पर भी प्रसन्न हुए और मेरी मुह मांगी मुराद पूरी हो गई.. मुझे यह कामिक्स मिली पटना जंक्शन के पास वाले एक बुक स्टोल पर(मीठापुर सब्जी मार्केट के कोर्नर वाला बुक स्टोर).. और पढकर दिल को उतनी ही ठंढक मिली जितनी कि एक बच्चे को कुत्ते कि पूंछ खिंच कर मिलती है(ही ही ही :D)..

फिलहाल तो आप भी इसे पढ़िए.. :)



चूंकि इसमें अपनी कुछ यादें भी जुडी हैं सो सोचता हूँ कि इसे अपने दूसरे ब्लॉग पर भी डाला जाए.. :) शायद तीन-चार दिन बाद..

Sunday, April 18, 2010

बज्ज पर बज-बजाते कामिक्स दीवाने

एक दिन बस यूँ ही गूगल बज्ज पर मैंने एक मैसेज दिया "सुनो बज्ज गांव वालों.. क्या कोई Super Commando Dhruv(SCD) कि कामिक्स पढ़ना चाहता है?? अपना Email ID मुझे दिया जाए.. हर दिन एक कामिक्स उन्हें मेल कि जायेगी.. :D" और देखते ही देखते कामिक्स के दीवाने जुट गए वहाँ.. मैं अपना वादा तो नहीं निभा पाया "मतलब हर दिन ध्रुव कि एक कामिक्स मेल करने कि".. मगर फिर भी जिस किसी ने कोई डिमांड रखी और अगर वह कामिक्स मेरे पास थी तो मैंने उन्हें उसी समय मेल कर दिया..


"प्रतिशोध कि ज्वाला" का पहला पृष्ठ

कुछ दोस्तों कि चुहलबाजी भी शामिल थी वहाँ, तो कुछ लोग ऐसे भी थे जो पहली बार ध्रुव कि कामिक्स ट्राई करना चाह रहे थे.. मैंने पाया है कि पहली बार ध्रुव को ट्राई करने वालों में हमसे एक पीढ़ी पहले के लोग होते हैं.. मैंने अपने एक पोस्ट में लिखा भी था कि "हर पीढी का अपना एक नायक होता है.. जैसे मुझसे 10-15 साल पहले वाली पीढी के लोगों के लिये वेताल और मैंड्रेक नायक हुआ करते थे.. उस समय भारत में इंद्रजाल कामिक्स का प्रभुत्व हुआ करता था.. सो उस पीढी के नायक भी उसी प्रकाशन से छपने वाली कामिक्स की हुआ करती थी.. ठीक वैसे ही मेरी पीढी के लिये नायक ध्रुव और नागराज जैसे हीरोज हैं.."

अब जैसे जैसे लोगों ने रिप्लाई करना शुरू किया, मैंने उन्हें पहली कामिक्स भेजनी भी शुरू कर दी.. वह कामिक्स ध्रुव कि भी पहली कामिक्स थी.. "प्रतिशोध कि ज्वाला" जिसे मैंने पहले भी इस ब्लॉग पर कभी पोस्ट किया था..

सबसे पहले स्तुति जी आई जिन्होंने कामिक्स पाने के बाद तुरत बांकेलाल कि कामिक्स "बांकेलाल और राजसी तलवार" के लिए पेशकश भी कर दी, जिसे मैं ठीक से पढ़े बिना यह समझा कि वह बांकेलाल कि कामिक्स चाह रही हैं.. :)

डा.महेश सिन्हा जी आकर चिढा गए, बोले "बिल कब भेजोगे?" मैंने भी स्पोर्ट स्पिरिट दिखाते हुए उसी मजाक में कह दिया "महेश जी, अभी तो फ्री में बाँट रहे हैं.. एक बार लत लगने दीजिए फिर पैसा कमाएंगे.. :D"



इन सब के बीच स्तुति के कहने पर(बोले तो ऑन डिमांड :D) मैंने "चाचा चौधरी साबू और फुटबाल" सभी को मेल भेजना शुरू किया.. और बाद में "बिल्लू का समोसा" कि भी बारी आई..



तो पूरी बात का लब्बोलुआब यह हुआ कि इस एक पोस्ट में आपके सामने लेकर आया हूँ मैं चार कामिक्स :) जिसमे से एक मैं पहले भी यहाँ ला चुका हूँ, मतलब तीन नए कामिक्स.. फिलहाल तो आप इस पोस्ट में दिए लिंकों का चक्कर लगा कर तीनों कामिक्स ढूंढें और मजे लें.. मैं जान बूझ कर सभी लिंक इकट्ठे नहीं दे रहा हूँ, कुछ मेहनत आप भी तो करें.. ही ही ही.. :D

Wednesday, February 17, 2010

पहला प्यार और नताशा


मुझे वह अच्छी लगाती थी, और मैं उसे कभी-कभी नताशा कह कर बुलाता था.. वह मुझसे पूछती थी कि ये नताशा कौन है, मैं बस कहता कि ऐसे ही.. अब उससे कौन कहे कि मेरा पहला प्यार का नाम नताशा ही है.. मैं दिल ही दिल में खुदा को शुक्रिया अदा करता था कि वह कामिक्स नहीं पढ़ती थी.. कुल मिलकर कुछ ऐसा ही नशा हुआ करता था उस कामिक कैरेक्टर का..

पिछले पोस्ट में गौतम जी ने मुझे भी मेरा पहला प्यार याद दिला दिया.. मेरा शुरू से ये मानना रहा है कि हर पीढ़ी का अपना अलग हीरो होता है.. जैसे मुझ से ४-५ साल पहले कि पीढ़ी का वेताल हुआ करता था कमोबेश वैसा ही मेरे उम्र के लोग अपना हीरो ध्रुव और नागराज जैसे कैरेक्टर में ढूँढते रहे.. फिर कब जवान हुए और कब प्यार हुआ कुछ पता ही नहीं चला.. मेरी कई मित्र भी हैं जिसे अपना पहला प्यार ध्रुव या डोगा में दिखता रहा है, वहीँ कईयों को नागराज भी खूब भाता रहा है..

नताशा का पहला परिचय ग्रैंड मास्टर रोबो में कराया गया था.. मैंने बहुत पहले कभी ग्रैंड मास्टर रोबो नामक कामिक्स पोस्ट भी की थी जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं.. नताशा का पिता रोबो जो अपराध की दुनिया का बादशाह हुआ करता था, जब तक की वह ध्रुव से नहीं टकराया था.. नताशा उसके रोबो ट्रूप्स की कमांडर हुआ करती थी.. फिर जब वह चंडिका उर्फ श्वेता को जान पर खेल कर उसकी जान बचाते देखती है तो अपराध की दुनिया छोड़ देती है.. वैसे पूरी कहानी पढ़ने के लिए आप ग्रैंड मास्टर रोबो वाले लिंक से उस कामिक्स को डाउनलोड कर सकते हैं..

अब बढते हैं अगले प्रेम की ओर.. ऋचा.. वह भी ध्रुव के कामिक्स की ही कैरेक्टर है.. जो छद्म वेश रखकर ब्लैक कैट भी बनती है और अपराधियों से भी लड़ती है.. खाली समय में वह जिमनास्ट है, वही साथ में एक सुपर कम्प्युटर जीनियस भी.. आप फिलहाल ब्लैक कैट की पहली कामिक्स पढ़े, बाकी अगले पोस्ट में अपने एक और प्यार के साथ लौटता हूँ.. वैसे भी यह कामिक्स दो भागों में बनती हुई है.. सो मुझे जल्द ही आना है दूसरा भाग पोस्ट करने के लिए.. :)

"ब्लैक कैट" कामिक्स का डाउनलोड लिंक


आप कामिक्स डाउनलोड करने के लिए ब्लैक कैट कामिक्स की तस्वीर पर भी क्लिक कर सकते हैं..

Sunday, February 14, 2010

वेलेंटाइन-दिवस पर अपनी कामिक्स वाली माशुकाओं की याद में...

.....एक पूरा अर्सा ही बीत गया था इस ब्लौग पर कुछ लिखे हुए। आज अचानक वेलेंटाइन-दिवस के इस प्रेमोत्सव पर कुछ लिखने का मन आया तो स्वभाविक रुप से उन माशुकाओं की याद आयी जिनके साथ पला-बढ़ा हूँ। वेलेंटाइन-दिवस...पूरे सप्ताह के अलग-अलग दिनों को अलग-अलग नामों और अलग-अलग ढ़ंग से मनाती एक पूरी पीढ़ी मुझे अचानक से प्रौढ़ हो जाने का अहसास दिलाती है...और इस अहसास से उदास हुआ मन धम्म से बैठ जाता है कुछ पुरानी यादों का पुलिंदा खोल कर। मन का वो आशिक-कोना, जो एक बचपने में ही जवान हो गया था और अब तलक जवानी की उस चौखट पर सर रगड़ रहा है, उसी पुलिंदे से निकालता है एक फ़ेहरिश्त अपनी चंद चिरयुवा प्रेमिकाओं की। नहीं, इस "प्रेमिका" शब्द से धोखा न खायें। ये पूर्णतया एकतरफा इश्क का मामला है।...मामला है? नहीं, "मामले हैं" कहना उचित होगा। आइये नजर दौड़ाइये मेरे साथ ही इस फ़ेहरिश्त पर कि जानता हूँ मैं कि मेरे जैसे जाने कितने ही जवान हुये वो बचपन वाले आशिकों की फौज ने किस-किस जतन से इस फ़ेहरिश्त को संभाले रखा है युगों-युगों से।

फ़ेहरिश्त की क्रमवार सूचि में भले ही ढ़ेरों दुविधायें हों, किंतु पहले स्थान पर निर्विवाद रूप से डायना थी, है और रहेगी- अनंत काल तक। हैंग ऑन! हैंग ऑन!! मैं प्रिंस चार्ल्स वाली राजकुमारी डायना
की बात नहीं कर रहा। मैं बात कर रहा हूँ डायना पामर की...अपने, हमसब के हीरो वेताल उर्फ फैंटम उर्फ चलते-फिरते प्रेत की प्रेयसी और पत्‍नि डायना की। वो पहली नजर का पहला प्यार वाला
किस्सा था डायना के संग। उधर वेताल को हुआ, इधर मुझे भी। इंद्रजाल कामिक्स के उन पन्नों में मंडराती किसी स्वप्न-सुंदरी सदृश ही डायना एकदम से दिन का चैन और रातों की निंदिया उड़ा ले गयी थी उन दिनों। ये उन दिनों की बात है, जब अपने फैंटेसी की मनमोहक दुनिया बसाया हुआ बचपन सहर्ष ही किट और हेलोइश जैसे प्यारे-प्यारे जुड़वां बेटे-बेटी का पिता कहलाने को तैयार था। हवा-महल के उन सुहाने दिनों में, बौने बंडारों के जहर बुझे तीरों के सुरक्षा-घेरे में, खोपड़ीनुमा गुफा की उन ठंढ़ी तलहटियों में, शेरा और तूफान के संग वाली सैरों में और वेताल के साथ-साथ ही मंडराती चुनौतियों के खिलाफ़ छेड़ी हुई जंगों में...खिलखिलाती मचलती हुई डायना...उफ़्फ़्फ़्फ़!!! ...और जब अपने मि० वाकर उर्फ चलते-फिरते प्रेत ने प्रणय-निवेदन किया था हमारी डायना से और फिर डायना का उस निवेदन को सहर्ष स्वीकारना...आहहा! कैसा माहौल था वो खुशनुमा!! मानो डायना ने हमारा प्रणय-निवेदन ही स्वीकारा हो प्रत्यक्षतः.... :-) शायद याद हो आपसब को कि शादी में सुदूर ज़नाडु से चलकर अपना प्यारा जादूगर खुद मैण्ड्रेक भी आया था समारोह में हिस्सा लेने।

...और मैण्ड्रेक के साथ ही याद आती है प्रिसेंज नारडानारडा के ही महल के बगीचे में मैण्ड्रेक का इजहार अपने प्यार का राजकुमारी नारडा के प्रति और फिर

नारडा का ज़नाडु में स्थानंतरित होना लोथार और मोटे बटलर का साथ देने, शायद इंद्रजाल कामिक्स की दुनिया का एक और शो-केस इवेंट था। इसी फ़ेहरिश्त में यूं तो बेला भी शामिल थी, लेकिन बीतते वक्त के साथ उसकी तस्वीर तनिक धुमिल हो गयी है। बहादुर की बेला। कहानी के प्लाट में तमाम विविधतायें होते हुये भी बेला का तनिक रफ और टफ व्यक्तित्व मुझे ज्यादा रास नहीं आता। कराटे में वैसे तो डायना भी ब्लैक-बेल्ट थी, लेकिन फिर भी उसकी नजाकत और उसके जिस्म का लोच एक अलग ही अफ़साना बयान करते थे।

फ़ेहरिश्त में आगे चंद और विदेशी नायिकाओं का आगमन होता है। यकीनन लुइस लेन मेरे लिये
डायना के समक्ष ठहरती है। डेली प्लानेट के सौम्य और मृदुभाषी रिपोर्टर क्लार्क केंट की दोस्त और प्रेयसी जब क्लार्क केंट को सुपरमैन के ऊपर तरजीह देती है, एक झटके में मेरा दिल ले जाती है। बात उन दिनों की है जब अचानक से इंद्रजाल कामिक्स का प्रकाशन बंद हो गया था और विदेश से आनेवाले मेरे एक रिश्तेदार ने मेरे कामिक्स-प्रेम को देखते हुये मेरे लिये चंद डीसी और मार्वल कामिक्स का पूरा सेट उपहार में लेकर आये थे। उन दिनों जब डायना दिखनी बंद हो गयी थी, लुइस लेन आयी थी एक बहुत ही मजबूत विकल्प बन कर। सुपरमैन की प्रेयसी किसी भी मामले में कहीं भी सुपरमैन से कम नही थी{है}। याद आता है मुझे क्लार्क कैंट और लुइस का विवाह और उन दिनों किसी कारणवश सुपरमैन अपनी सारी शक्तियाँ खो चुका था, तब तमाम विपदाओं से लड़ती हुई लुइस लेन ने अकेले ही क्लार्क कैंट को मुसिबतों से निकाला था। लुइस लेन और मेरा प्रेम-प्रसंग अभी जारी है कि हर महीने मेरे पास अभी भी डीसी कामिक्स से सुपरमैन के निकलने वाले तीन टाइटल्स लगातार आ रहे हैं।

...और इसी जारी प्रेम-प्रसंगों की एक सबसे प्रबल प्रतिभागी है मेरी जेन। जी हाँ, अपने नेक्स्ट डोर
नेबर पीटर पार्कर उर्फ स्पाइडर मैन की मेरी जेन । दि बोल्ड एंड सेन्सुअस मेरी जेन...उफ़्फ़्फ़! उन तमाम बनते-बिगड़ते रिश्तों की उलझनें, उन तमाम विलेनों के संग की उठा-पटक, उन तमाम रातों की चिंतित करवटें जब पीटर अपने स्पाईडी अवतार में दुश्मनों की बैंड बजा रहा होता है...मैंने मेरी जेन का साथ निभाया है। इस लिहाज से मैं कई बार चक्कर में भी पड़ जाता हूँ। चक्कर में कि मेरी जेन या डायना पामर...?? मेरी या डायना...??? और इस चक्कर में डायना का पलड़ा भारी करने हेतु मैं कभी इंटरनेट पे तो कभी कबाड़ियों और पुराने दुकानों के गर्द पड़ चुके कोनों में फैंटम कामिक्सों को तलाशते रहता हूँ। इंद्रजाल कामिक्स के लुप्तप्राय हो जाने के बावजूद अब भी जुड़ा हुआ हूँ येन-केन-प्रकारेन फैंटम की दुनिया से...तो डायना का पलड़ा हमेशा भारी ही रहता है।

इसी फेहरिश्त में कहीं पर सेलिना भी है। सेलिना....कैट वोमेन...बैटमेन की प्रेमिका। वैसे शायद प्रेमिका कहना अनुचित होगा। क्योंकि सेलिना का अपराधिक-चरित्र और बैटमैन का अपराध को समूल नाश करने का लिया गया वचन इस प्रसंग को आगे बढ़ने से रोकता है। किंतु अपने अल्टर-इगो में ब्रुस वेन कही-न-कहीं सेलिना के प्रति झुकाव तो महसूस करता ही है और उसी झुकाव की वजह से हम बैटमैन के चाहनेवाले भी दिलोजान से कामना करते रहते हैं कि ये खूबसूरत सेलिना छोड़ क्यों नहीं देता है चोरी-चकारी।

...और यहाँ से फेहरिश्त वापस मुड़ती फिर से होम-ग्राउंड की ओर।
ध्रुव की सहचरी कमांडर नताशा हो या फिर नागराज की प्रेयसी विसर्पी हो या
हो अपने डोगा की संगिनी सोनु उर्फ मोनिका । कुछ और नाम भी जुड़ते चले
जा रहे हैं, लेकिन पोस्ट तनिक लंबी होती जा रही है। ...तो फेहरिश्त की अगली किश्त फिर कभी फुरसत में जब अगली
बारआता हूँ पोस्ट लिखने। तब तक के लिये मेरे ही जैसे आपसब तमाम आशिकों को सलाम...!

.....

Wednesday, January 20, 2010

सज़ा-ए-मौत - सुपर कमांडो ध्रुव (Saja-e-maut - Super Commando Dhruv)

शायद सन् 1998-99 के आस पास इस कामिक्स को पढ़ा था.. और पढ़ते ही दिवाना हो गया था.. तब से लेकर अभी तक ना जाने कितनी ही बार इस कहानी को पढ़ चुका हूं..

इस कामिक्स कि कहानी शुरू होती है बार्को नामक एक माफिया किंग के अड्डे से, जो ग्रैंड मास्टर रोबो के लिये काम करता है.. किसी कारण से वह सुपर कमांडो ध्रुव को अपने रास्ते से हटाना चाह रहा था(इसके पीछे कि कहानी जानने के लिये हमें "कमांडर नताशा" कामिक्स में झांकना पड़ेगा, वह फिर कभी).. साथ ही वह यह भी जानता था कि धुव को मारना लगभग असंभव सा काम है.. बार्को यूरोप के अपराध संघटन से एक हत्यारे को मंगाता है जिसके लिये उसने खूब पैसा खर्च किये हैं.. बार्को इस उम्मीद में बैठा था कि शायद कोई बेहतरीन खूनी हत्यारा अत्याधुनिक हथियारों के साथ राजनगर, भारत आयेगा.. मगर वह यह देख कर आश्चर्यचकित रह जाता है कि एक ऐसा व्यक्ति आया है जो अपना नाम "स्किमो" बता रहा है और उसके पास एक ब्लेड तक नहीं है जिससे किसी इंसान कि हत्या की जा सके..

इस कामिक में "स्किमो" नामक कैरेक्टर बेहतरीन गढ़ा गया है.. उसके पूरे शरीर पर कट्टम-कुट्टा वाले खेल के निशान बने हुये हैं, और जो भी उसके लिये काम करता है उनके हाथों पर भी वैसे ही निशान बने रहते हैं.. मुझे समझ में नहीं आता है कि कहानियों और सिनेमा में ऐसे विलेन किरदार क्यों बनाये जाते हैं जिनके गिरोह के सभी सदस्य के शरीर के किसी ना किसी हिस्से में ऐसे निशान बने होते हैं.. मुझे मैन्ड्रेक के कामिक्स का "अष्टांक" नामक किरदार याद आ रहा है.. वहां भी कुछ वैसा ही लोचा था..

खैर स्किमो पर वापस आते हैं.. स्किमो बार्को को समझाता है कि अगर किसी हथियार से ध्रुव को मारा जा सकता तो ध्रुव कभी का इस दुनिया से उठ गया होता.. क्योंकि वह अपना भेष बदल कर या मुखौटा लगा कर सुपर हिरोगिरी नहीं करता है.. उसके सभी पहचान भी खुले हुये हैं, और उसके अनगिनत दुश्मन भी हैं.. अपने नाम के ही अनुसार स्किमो स्कीम बना कर मारता है.. और उसने स्कीम कुछ ऐसा बनाया है जिससे कि ध्रुव को कानून ही "सज़ा-ए-मौत" कि सजा सुना दे तो ध्रुव कानून के खिलाफ कभी नहीं जायेगा..

अब आगे कि कहानी को जानने के लिये आपको यह कामिक्स पढनी होगी, इस कामिक्स को पढ़ने के इच्छुक व्यक्ति इस लिंक से जाकर कामिक्स खरीद सकते हैं..



मेरा रेटिंग - **** (4/5)


संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..

Friday, August 28, 2009

अनुराग कश्यप और छः फिल्मी सितारे डोगा के रोल के लिये रेस में

क्या आपको पता है, डोगा के ऊपर बनने वाले सिनेमा जिसे अनुराग कश्यप डायरेक्ट कर रहे हैं, अनुराग कश्यप जी ने शुरूवात में छः फिल्मी सितारों में से किसी एक का चुनाव करने के बारे में सोचा.. मगर अंत में बात बनी कुनाल कपूर को लेकर.. कुनाल कपूर को लेकर अनुराग कश्यप इसलिये सहमत हुये क्योंकि वह अभी तक किसी भी ऐसे रोल में बंधे नहीं है जिसकी छवी डोगा के ऊपर हावी हो सके..

आज ही किसी साईट पर मैं पढ़ रहा था कि कुनाल इसके लिये आजकल अपना शरीर बनाने को लेकर खूब मेहनत भी किये जा रहे हैं.. दुर्भाग्य वश वह लिंक मुझसे खो गया और मैं उस खबर की लिंक यहां नहीं लगा पा रहा हूं..

अभी फिलहाल आप यह पांच उन फिल्मी सितारों का डोगा के ऊपर बना कार्टून देखें जिसे मैंने इस लिंक से लिया है.. आप इस लिंक पर जाकर इस बारे में कुछ मशालेदार खबर भी पढ़ सकते हैं..



शाहरूक खान डोगा के रूप में



सनी देओल डोगा के रूप में.. मुझे सबसे ज्यादा हंसी इस कार्टून को लेकर आयी, क्योंकि सनी देओल के पापा यानी धरम पा जी का ही एक डायलॉग बहुत प्रसिद्ध है, "कुत्ते-कमीने, मैं तुम्हारा खून पी जाऊंगा.." और डोगा को कुत्तों से बहुत प्यार जो है.. ;)



आमिर खान डोगा के रूप में.. वैसे आमिर खान का गजनी रूप भी बढ़िया लगा.. :D



अक्षय कुमार डोगा के रूप में.. ये बेचारे तो डोगा बन कर भी थम्स अप के पीछे ही भागते रहेंगे.. :D



अभिषेक बच्चन डोगा के रूप में.. और अभिषेक बच्चन का द्रोणावतार के बारे में आप क्या कहते हैं? :)


आज बहुत दिनों बाद इस ब्लौग पर लिखने बैठा हूं.. इस चिट्ठे को मैं लगभग भूल सा ही गया था, मगर पिछले दो-तीन दिनों से देखा कि इसके ट्रैफिक में अचानक से कुछ तेजी आई.. स्टैट काऊंटर पर जाकर पता किया तो पता चला यहां ढ़ेर सारे नये लोग राज-कामिक्स के साईट से आ रहे हैं.. उस लिंक पर जाने पर पता चला कि वहां मेरे इस ब्लौग के चर्चे हो रहे हैं जिसे मैंने लगभग चार महिनों से अपडेट भी नहीं किया है.. मगर अब से मेरी कोशिश यही रहेगी कि मैं लगातार इस पर भी अपने एक अन्य ब्लौग कि तरह ही बना रहूं..

अगर आप मेरे दूसरे बलौग को पढ़ना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर जा सकते हैं..

Sunday, February 8, 2009

कैसे एक कामिक्स ने बदल दी जिंदगी.. "चुंबा का चक्रव्यूह"

जैसा मैंने पहले कहा था की मैं आने वाले पांच कामिक्स के साथ गुजारे हुये अपने जीवन के कुछ हसीन पल भी आप लोगों के साथ बाटूंगा और वैसा कुछ ही मैं इस कामिक्स के साथ भी करने के इरादे में था.. मगर मैं यह पोस्ट लिखता उससे पहले ही मुझे इस कामिक्स से संबंधित एक बहुत ही जबरदस्त कहानी आरकुट के एक कम्यूनिटी में मिल गई.. तो आज मैं आप लोगों के सामने ए.पी.दुबे जी की कहानी पेश कर रहा हूं.. मगर उससे पहले मैं आप लोगों के सामने इनका कुछ परिचय भी देता चलूं(जैसा मुझे इनके आरकुट प्रोफ़ाईल से मिला है)..

कामिक्स के बहुत बड़े पंखे(फैन) हैं यह महाशय.. बचपन से ही कामिक्स के दिवाने, खासकर के सुपर कमांडो ध्रुव के.. इन्होंने तो अपने होने वाले संतानों के नाम तक सोच लिया है(उसकी भी एक अलग कहानी है जो फिर कभी).. अगर लड़का हुआ तो ध्रुव और यदी लड़की हुई तो श्वेता(मेरे इस चिट्ठे को पढ़ने वाले कई पाठ्क ध्रुव के बारे में बहुत ज्यादा नहीं जानते हैं, सो उनके लिये यह जानकारी - ध्रुव की छोटी बहन का नाम श्वेता है).. यह अभी हाल फिलहाल में एक साईट भी शुरू किये हैं जिस पर आप यहां क्लिक करके पहूंच सकते हैं.. तो चलिये आज सुनते हैं इनकी दिलचस्प कहानी जो ध्रुव के कामिक्स चुंबा का चक्रव्यूह के साथ जुड़ी हुई है.. यह कहते हैं -



यह कहानी है तड़ित चालक के बारे में, जो मैंने ध्रुव के किसी कामिक्स में पढ़ा था.. ठीक-ठीक याद नहीं मगर शायद मैं आठवीं या नवमीं कक्षा में था जिस समय की यह घटना है.. हमारी शिक्षिका तडित चालक के बारे में हमें पढ़ा रही थे और उन्होंने कक्षा से पूछा, "कोई तडित चालक के बारे में जानता है?" मेरे और मेरे ही एक सहपाठी के अलावा और किसी ने हाथ नहीं उठाया..

हमारी शिक्षिका ने सबसे पहले मुझसे ही पूछा और मैंने उन्हें विस्तार पूर्वक बताया.. मेरे उत्तर से पूर्णतः संतुष्ट होने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा की कहां से तुम्हें यह जानकारी मिली? मैंने बताया कि पिछले साल मैंने एक कामिक्स में इसके बारे में विस्तार से जाना था और उन्हें मेरी बातों पर भरोसा नहीं हुआ.. तब मेरे एक सहपाठि ने मेरी बातों का समर्थन किया जो अभी का मेरा सबसे अच्छा मित्र है.. और हमने कहा कि हम आपको कल यह सारी बात कामिक्स में भी दिखा देंगे..

अगले दिन मेरा मित्र उस कामिक्स के साथ विद्यालय आया लेकीन गणित के शिक्षक को एक लड़के ने बता दिया कि मेरा मित्र अपने स्कूल बैग में कामिक्स लेकर आया है.. हमारे गणित के शिक्षक ने हमें इसकी सजा देनी चाही मगर हम दोनों ही इसके लिये तैयार नहीं थे, क्योंकि हम दोनों की ही नजर में हमारी कोई गलती नहीं थी जो हम सजा भुगतते.. हमने कहा कि कृप्या हमारी विज्ञान की शिक्षिका को बुलाया जाये..

हमारे गणित के शिक्षक ने हमारी विज्ञान की शिक्षिका के साथ-साथ हमारे प्रधानाध्यापक को भी बुला लिया.. और उन सबके सामने हमने बताया कि हमने कहां से तडित चालक के बारे में पढ़ा था.. हमारी विज्ञान की शिक्षिका ने ना सिर्फ हमे शाबासी दी वरन् हमें पूरी कक्षा के सामने हीरो जसा बना दिया और वह भी प्रधानाध्यापक के सामने..

इन सब चीजों के परे, मुझे इस घटना से मेरा सबसे अच्छा मित्र मिल गया.. :)

आप इस कामिक्स को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाकर कामिक्स ऑर्डर कर सकते हैं..

आप भी तडित चालक के बारे में जानने के लिये पढ़ सकते हैं चुंबा का चक्रव्यूह, पृष्ठ नंबर 34.. :)

Wednesday, January 21, 2009

सुपर कमांडो ध्रुव और मुक्ता

कल मैं अपनी एक मित्र मुक्ता से फोन पर बात कर रहा था जो कुछ मजेदार सा था.. उसी का एक अंश मैं यहां लिख रहा हूं..

मैं : "उस दिन मैं पूरे दिन भर तुम्हारा इंतजार करता रहा और तू नहीं आयी.. अबे अगर नहीं आना था तो फोन कर देती या मैसेज दे देती.."

मुक्ता : "अरे यार मैं बोली थी ना की मैं उस दिन आफिस चली गयी थी.."

मैं : "नहीं तू बोली थी की तू उससे एक दिन पहले सैटरडे को आफिस गयी थी.. अब मैं घर से खाने का सामान लाया हूं तो लालची की तरह मेरे घर आना चाह रही है.."

मुक्ता : "अच्छा गलती हो गई.. अब डांटो मत.."

मैं : "ठीक है नहीं डाटूंगा मिल तो पिटाई करता हूं.."

मुक्ता : "पिटाई तो मैं करूंगी तेरा.."

मैं : "क्यों?"

मुक्ता : "बस ऐसे ही मन कर रहा है.."

मैं : "अब तो तू मेरे हाथ से पिटने के लिये तैयार रहो.."

मुक्ता : "तू लड़की पर हाथ उठायेगा?"

मैं : "हां.."

मुक्ता : "तू ऐसा नहीं कर सकता है.. मुझे मालूम है तू लड़की पर हाथ नहीं उठाएगा.."

मैं : "कभी बचपन में कामिक्स पढी है सुपर कमांडो ध्रुव का?"

मुक्ता : "हां.. पर क्यों पूछ रहा है?"

मैं : "वो लड़की पर हाथ नहीं उठाता था.. तू क्या मेरे को सुपर कमांडो ध्रुव समझ रखी है? मैं लड़कीयों पर हाथ के साथ-साथ पैर भी उठा सकता हूं.."

मुक्ता : "अबे तू वही है सुपर कमांडो ध्रुव, लेकीन मुझे ना मारना.. समझा? तू भी क्या याद दिला दिया.. सुपर कमांडो ध्रुव.."

सम्मीलित हंसी.. "हा हा हा हा...."


मैंने यह पोस्ट 21 मार्च सन् 2008 को अपने चिट्ठे मेरी छोटी सी दुनिया पर पोस्ट किया था.. चूंकी यह पोस्ट कामिक्स से जुड़ी मेरी जिंदगी का एक हिस्सा ही है सो आज मैं इसे यहां भी पोस्ट कर रहा हूं.. मेरे अगले पोस्ट में आप चुंबा का चक्रव्यूह पढ़ सकते हैं.. और हां भूले नहीं, साथ में होगी इस कामिक्स से जुड़ी मेरे बचपन की एक कहानी भी.. :)

Sunday, January 18, 2009

डबल धमाका! "मैंने मारा ध्रुव" को और "हत्यारा कौन"

आप ध्रुव कि कौन सी कामिक्स पढ़ना चाहते हैं वाले पॉल में दूसरे स्थान पर यही दोनों कामिक्स आयी थी जिसे मैंने इस पोस्ट का शीर्षक बनाया है.. और अपने उस पोस्ट में किये वादे के मुताबिक चलते-चलते आपको इससे जुड़ी बचपन कि कहानी भी सुनाते चलना है..

बात सन् 1994 की है.. मैं उस समय 13 साल का था और चक्रधरपुर(जो अब झारखंढ में है) में रहता था.. उसी समय मेरे छोटे चाचाजी कि शादी तय हुयी थी और इंगेजमेंट के लिये मुझे और मेरे पापाजी को पटना से होते हुये दरभंगा जाना था.. हमें पटना के लिये ट्रेन पकड़ने के लिये पहले चक्रधरपुर से जमशेदपुर जाना था और वहां से पटना के लिये ट्रेन पकड़नी थी.. हम इस्पात एक्सप्रेस से घंटे भर में समय से जमशेदपुर पहूंच गये.. हमारे पास अभी भी 1 घंटे का समय था.. जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं कि बचपन में हम बच्चों को कामिक्स खरीदने कि सख्त मनाही थी, मगर हमें ट्रेन में कामिक्स खरीदते समय मना नहीं किया जाता था.. सो इस मौके को मैं गवाना नहीं चाहता था और पहूंच गया कामिक्स के स्टॉल पर..

वहां नयी-नयी कामिक्स "मैंने मारा ध्रुव को" स्टॉल पर टंगी हुई थी.. मैंने आव ना देखा ताव और झट से कामिक्स खरीद ली.. ये भी नहीं देखा कि इसका कोई अगला भाग तो नहीं है? ये भी नहीं सोचा कि अगर इसका अगला भाग भी होगा तो वो कभी पढ़ने को मिलेगा या नहीं.. मैं उचक कर ट्रेन में अपने जगह पर बैठकर कामिक्स पढ़ने लगा, और जब तीन कहानी खत्म हो गयी फिर जाकर पता चला कि ये तो आधी ही है.. और फिर उदास हो गया.. ये उदासी ज्यादे देर तक नहीं रही क्योंकि अपने चाचाजी की इंगेजमेंट में जो जा रहा था..

"हत्यारा कौन" कामिक्स मुझे पटना आने के बाद शायद सन् 1997 में पढ़ने को मिली.. मगर इसका रोमांच तब तक कम नहीं हुआ था.. :)






चलते-चलते कुछ इन कामिक्स की भी बात कर ली जाये.. मेरी नजर में यह दोनों ही कामिक्स ध्रुव के कामिक्स का मील का पत्थर कहा जा सकता है, जिसमें रोमांच अंत तक बना रहता है.. शुरूवात होते ही एक बड़ा झटका लगता है कि ध्रुव मर कैसे गया, मगर मन में यह बात भी रहती है कि नायक कभी मरता नहीं, और एक विश्वास भी मन में होता है कि वो अंत में वापस जरूर आयेगा.. इन दोनों कामिक्स का प्रमुख किरदार "कंकालतंत्र" ही-मैन के कामिक्स का "स्केलेटन" का नकल भर ही है जिसके पास काफी कुछ उसी के जैसी शक्तियां भी है.. मगर फिर भी कहानी काफी चुस्त है.. दो कामिक्स में छः कहानियों को पढ़ने का अनुभव भी अलग ही है.. इसमें ध्रुव के लगभग सारे खलनायकों को एक जगह इकट्ठा किया गया है जिसमें वैज्ञानिकों के साथ-साथ तंत्र-मंत्र सम्राट चंडकाल भी है.. फिलहाल पूरी कहानी जानने के लिये आप यह कामिक्स डाऊनलोड करके पढ़िये.. :)

लिंक
मैंने मारा ध्रुव को का डाऊनलोड लिंक
हत्यारा कौन का डाऊनलोड लिंक

डाऊनलोड करने के लिये आप तस्वीर पर भी क्लिक कर सकते हैं..


संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..