Thursday 22 April 2010

जब प्रतिशोध लेने कि बात करने वाला पिट गया, मेरा मतलब विलेन :)

सन 1996 कि बात है, उस जमाने में कामिक्स का नशा सर चढ़ कर बोला करता था(वैसे बोलता तो अभी भी वैसे ही है :D).. मगर घर में पापा-मम्मी कामिक्स के धुर-विरोधी हुआ करते थे.. मगर एक दिन "जैसे हर कुत्ते का एक दिन होता है" मेरा भी दिन आया, और पापा जी मुझे बोले कि "जाओ बच्चा तुम्हे सौ रूपये देता हूँ.. इसमें जितना कामिक्स खरीद सकते हो खरीद लो.." उनकी यह वाणी मुझे किसी आकाशवाणी से कम नहीं लगी.. ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में देवकी के ब्याह के समय कंस को आकाशवाणी सुनाई दिया था.. (वैसे कभी कभी सोचता हूँ कि महाभारत काल और उसके आस पास के काल मे इत्ते सारे आकाशवाणी क्यों लोगों को सुनाई देता था?? :o ;))

अब एक अंधे को क्या चैये, बस दो ऑंखें.. उस समय मैं बिक्रमगंज नामक शहर में रहता था, जो बिहार के रोहतास(सासाराम) जिले में अवस्थित है.. वहाँ राज कामिक्स मिलता नहीं था और मैं अपने अमूल्य सौ रूपये डायमंड कामिक्स के चाचा चौधरी जैसे कामिक्स पर खर्च करने को तैयार नहीं था.. अब विकट स्थिति जान पड़ी.. करें तो क्या करें.. बस संभाल कर रख लिया वह सौ रूपया, सोचा "केकयी" जैसे ही समय आने पर इसका उपयोग करूँगा और बेचारे पापा मना भी नहीं कर पायेंगे..

फिर वो दिन भी आया जब पापाजी को किसी मीटिंग में डेहरी-ऑन-सोन जाना था और साथ में हम भी लटक लिए.. पापाजी गए मीटिंग के अंदर और हम उनके बॉडीगार्ड साहब को लेकर पहुँच गए वहाँ के रेलवे स्टेशन.. ध्रुव या नागराज का कोई कामिक्स तो मिल ही जायेगा, इसी उम्मीद में.. और वहाँ से ख़रीदे तीन कामिक्स.. तीनो के तीनो ही ध्रुव के..
  • "स्वर्ग कि तबाही"

  • "दलदल" और

  • "ब्लैक कैट"


जिसमे से स्वर्ग कि तबाही ध्रुव कि एक दूसरी कामिक्स का आखरी भाग था, उसके पहले भाग का नाम आदमखोरों का स्वर्ग था.. इन दोनों कामिक्स को मैं पहले भी आपके सामने ला चुका हूँ जिसका लिंक उन कामिक्स के नाम के साथ दे रहा है मैंने.. Link Deleted on request of Sanjay Gupta Ji..

दूसरी कामिक्स "दलदल" अपने आप में पूरी कामिक्स थी.. आगे पीछे कोई भी रोवनहार नहीं था उस कामिक्स का, मतलब कोई दूसरा भाग नहीं था.. :)

और तीसरी कामिक्स "ब्लैक कैट" के साथ भारी पंगा हो गया.. लेते समय मैंने देखा नहीं और पढ़ने पर पता चला कि यह तो पहला भाग है.. अब दूसरा भाग कहाँ से आये.. भारी लोचा.. अब तो पटना आयें तो यहाँ पता करे उसके दूसरे भाग के बारे में.. डेहरी-ऑन सोन जाए तो फिर वही चक्कर.. पटना के पुस्तक मेला में भी मेरे घूमने कि वजह सिर्फ यही कामिक्स थी(उस जमाने में साहित्य भगोरों में मेरा नाम अव्वल हुआ करता था सो किसी साहित्यिक पुस्तक मैं खरीदने से रहा.. वैसे मेरा मानना है कि कामिक्स भी साहित्य के ही किसी श्रेणी का हिस्सा है :)).. "रोबो का प्रतिशोध" नाम था उसके दूसरे भाग का.. सबसे बड़ी मुसीबत तो यह कि पहले भाग में ध्रुव को बुरी तरह घायल दिखा दिया था.. मन में सवाल यह नहीं था कि वह बचा या नहीं, क्योंकि उसकी नई कामिक्स लगातार आ रही थी(ही ही ही :D).. सवाल यह था कि वह बचा तो कैसे बचा..

खैर एक दिन ब्रह्म देव मुझ पर भी प्रसन्न हुए और मेरी मुह मांगी मुराद पूरी हो गई.. मुझे यह कामिक्स मिली पटना जंक्शन के पास वाले एक बुक स्टोल पर(मीठापुर सब्जी मार्केट के कोर्नर वाला बुक स्टोर).. और पढकर दिल को उतनी ही ठंढक मिली जितनी कि एक बच्चे को कुत्ते कि पूंछ खिंच कर मिलती है(ही ही ही :D)..

फिलहाल तो आप भी इसे पढ़िए.. :)



चूंकि इसमें अपनी कुछ यादें भी जुडी हैं सो सोचता हूँ कि इसे अपने दूसरे ब्लॉग पर भी डाला जाए.. :) शायद तीन-चार दिन बाद..

10 comments:

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

:) बहुत प्यारा किस्सा.. वैसे हमे भी काफ़ी कम कामिक्स खरीदने को मिलती थी.. शिक्षाप्रद चीज़े कुछ ज्यादा मिलती थी..

लेकिन जब मेरे दोस्ट कामिक्स की दुकान लगाते थे तो हम भी एक दो अपनी कामिक्स रखवाकर उनकी फ़्री मे पढा करते थे..

वैसे इस बात पर अभी अभी ध्यान गया कि पहले आकाशवाणी इतना क्यू बोलती थी.. हर गलत मौके पर बोल उठती थी:D

Udan Tashtari said...

सही है यह कॉमिकन संसार!!

DEEPAK SHARMA KAPRUWAN said...

bachpan ke din yaad aa gaye ye sab dekhkar

abhi said...

कामिक्स के मामले में मुझमे तुम्हारे जितना तो पागलपन नहीं था लेकीन ध्रुव तो मेरा भी सबसे ज्यादा पसंदीदा कामिक्स रहा है...

और सही कह रहे हो ..कामिक्स भी साहित्य के ही किसी श्रेणी का हिस्सा है

अच्छा, पटना का पुस्तक मेला को बहुत ही ज्यादा miss करता हूँ भाई...वैसे हम तो वहां कामिक्स के लिए नहीं जाते थे :P हाँ कहानियों की किताबें के लिए जरूर जाते थे और जब तक पटना में रहे तब तक गए...

मुझे अब भी याद है आखरी बार 2002 में जब गया था पुस्तक मेला तो अटल बिहारी वाजपेयी की "मेरी इक्यावन कवितायेँ" किताब मैंने ली थी वहां से..

खैर बहुत बहुत मजा आया ये मस्त पोस्ट पढ़ के

anjule shyam said...

भैया हम इतने शोभाग्य शाली नहीं थे कि कभी पापा सो रूपये पकड़ाते और कहते जा बेटा जो तेरी मर्जी हो उसपे खर्च कर हम तो भैया पिट पिटा के कॉमिक्स पढ़ते रहे हैं.जेब खर्च भी बच्चों को चाहिए ये तो हमारे गावं में कोई सोचता तक नहीं था तो बड़ी मुश्किल से 2 रूपये का इन्तेजाम कर कॉमिक्स किराये पे लेके पढ़ी जाती थी,नहीं तो कुछ मेहरबान दोस्तों के मेहरबानी से ही ज्यादतर कॉमिक्स पढ़ी है बचपन में और पढने और कॉमिक्स गलत हाथ में (मतलब पापा मम्मी ) क हाथ में ना पड़े इसकी कहानी तो अलग ही है.आहार उसके बारे में लिखूं तो दो चार महाभारत तो लिख ही सकते हैं..
हाँ एक बात कि मुझे हमेश शिकायत रहती थी की कॉमिक्स पार्ट में ना हो.पार्ट में हूवा तो दिमाग का किम बनना तयं था अब सोचते रहो इसके आगे क्या होगा...पार्ट का तो पता नहीं कब मिलेगा अपने को पढने को ....दुकान पे दिख भी जाता उसका पार्ट तो हसरत से देखने के अलवान कोई चारा नहीं था .क्यों की दो रूपये अपने pass कब honge ise तो कोई jyotsi भी नहीं bata sakta था...

हिमान्शु मोहन said...

लगे रहो पीडी!
जो सेवा हम जैसे संतों की कर रहे हो उसका मीठा फल ज़रूर मिलेगा तुम्हें।
बचपन की अधूरी प्यास जो तृप्त तो अभी भी खैर नहीं हो पाएगी, मगर थोड़ी बहुत बुझेगी ज़रूर।
बचपन को जिलाए रखने का शुक्रिया, बहुत-बहुत; अपने अन्दर भी और हमारे अन्दर भी।

अन्तर सोहिल said...

सौ रूपये की किस्मत तो कहां थी, अलबत्ता कभी-कभार दो रूपये ही मिल जाते तो उनकी कामिक्स ही किराये पर लाकर पढी जाती थी। चंपक और नंदन तो पापा ही कभी लाकर दे दिया करते थे।
रोबो का प्रतिशोध देने के लिये हार्दिक धन्यवाद

प्रणाम स्वीकार करें

Anonymous said...

What a crappy background! It has become impossible to read the blog. Please revert back to the old template. Otherwise the very purpose of spending time to share your thoughts will go waste.

thnks!

Mohit Trendster said...

वाह! क्या मजेदार अनुभव बांटा आपने. ये दीवानगी तो मुझमे भी रही है....बस इसी उधेड़बुन मे रहता था की किसी तरह 8 रुपये बच जाए तो कम से कम नयी वाली पतली कॉमिक खरीद लूँ और 8 ना सही तो 4 जुड़ जाए तो पुरानी कॉमिक हाफ रेट मे ले लूँ...

Down there in...d hau:t said...

Very gud initiative ans write up too!
Bachpan ki yaad gayi sach mein..Dhruv and Nagraj to apane bhi childhood Heros rahe hai..and I was as crazy as you seem to be about them.
Keep up the gud wor going!