Tuesday, July 6, 2010

आइये, कॉमिक्स से नयी पीढ़ी का विकास करें!


कॉमिक्स काफ़ी सारी विविधता और किरदारों के साथ आती है. साथ ही कॉमिक्स का सबसे बड़ा फायदा किसी बच्चे (खासकर slow learners or differently abled) के विकास मे होता है. सिर्फ बच्चे ही क्यों बड़ो को भी समान रूप से कॉमिक्स पढने का फायदा होगा. पर ज्यादातर अभिभावक कॉमिक्स को समय, पैसे, आदि की बर्बादी समझते है. जैसा की वो अब तक सुनते आ रहे है. उन्होंने कभी कॉमिक्स को खुद नहीं परखा जो सुन लिया वो मान बैठे. ये बहस तो लम्बी है की कॉमिक्स को सिर्फ बच्चो के लिए क्यों समझा जाता है पर यहाँ मै आप सबका ध्यान कॉमिक्स से होने वाले एक बड़े फायदे की ओर करना चाहता हूँ. विकसित होते और निरंतर कुछ न कुछ सीखते मस्तिक्ष को कॉमिक्स किस तरह विकास मे मदद करती है.


कॉमिक्स एकलौता ऐसा multimedia का साधन है जिसमे लगभग हर कोई आराम से अपनी सुविधा अनुसार चित्रों और कहानी को relate कर सकता है और उनमे हो रहे frame wise changes को समझ सकता है. ये खासियत बच्चो के दिमाग के विकास मे मदद करती है. क्या और किसी मनोरंजन के साधन मे है ये खूबी? अभिभावक अगर कॉमिक्स का सही तरीके और सोच से इस्तेमाल करें तो उनके बच्चो का बहुत बढ़िया विकास हो सकता है. साथ ही उनकी creativity और logical approach भी विकसित होता है. बस कॉमिक्स चुनते वक्त उसके मैटर पर एक बार उपरी नज़र डाल कर उसे देख लें. कुछ बढ़िया कॉमिक सीरीज़ आपके बच्चे को बहुत अच्छी सीख दे सकती है. यहाँ भी मै कहूँगा की अपने हिसाब से खुद कॉमिक्स चुनिये...हर बार की तरह सिर्फ दूसरो की मत सुनिये. कई अभिभावक और आलोचक शिकायत करते है की कुछ कॉमिक्स मे व्यसक दृश्य, बातें, खून-खराबा बहुत होता है. मेरा कहना ये है की सारी कॉमिक्स ऐसी नहीं होती, मनोरंजन के बाकी साधन जैसे टी.वी., इंटरनेट, पत्रिकाएँ यहाँ तक की अख़बार आदि भी इस मामले मे कॉमिक्स से कहीं ज्यादा आगे निकल गये है.....और कम से कम कॉमिक्स मे अंत मे अच्छाई की बुराई पर जीत तो होती है.....है ना?

अब तक तो हाल ये है की साहित्यिक गलियारों मे बच्चो की चीज़ कहकर नकार दी जाने वाली कॉमिक्स को बाल साहित्य की श्रेणी तक मे जगह नहीं मिलती. तो क्यों ना नयी पीढ़ी से एक नयी शुरुआत की जाये जहाँ कॉमिक्स को भी साहित्य जैसा सम्मान मिले (क्योकि कॉमिक्स के पीछे भी कई प्रतिभाएं दिन-रात मेहनत करती है).

Monday, July 5, 2010

रे संजय ताऊ! इधर भी देख लो! (Haryanvi Flavor)


भारतीय कॉमिक्स के सिमटते संसार से दुखी एक हरियाणा निवासी कॉमिक प्रशंषक की भारतीय कॉमिक्स के इक्का दुक्का बचे स्तंभों मे से एक राज कॉमिक्स के प्रमुख श्री संजय गुप्ता जी से काल्पनिक फ़रियाद. भाषा का मकसद किसी को आहत करना नहीं बल्कि सिर्फ मनोरंजन करना है.



"भई, म्हारा नाम जाट मोहित से! सब लोगन को म्हारा प्रणाम. मन्ने राज कॉमिक्स बड़ी चोखी लागये से. सारा गाँव दीदे काढ़े करे मारे पे फिर भी यो राज कॉमिक्स ना छोड़ के दी गयी. सारे कहवें की अच्छे चंगे जाट को तो कॉमिक्स ने खा गेरा. छोरियां कहवें से से की घना चीकना छोरा किंगे को डल्ले मार रिया है. पर मै अख्यन्न मे पंजे डाल के किसी की ना सुनु.....बस घनी बिमला सी विसर्पी के सपने बुनू सु. सब से कहूँ के घने दीदे मत ना काढो मै कौन सा पानी को पापा कह रिया हूँ....म्हारा तो यो ही फंडा है के "राज कॉमिक्स से म्हारा जनून".

इब बस संजय ताऊ से यो ही बिनती से के राज कॉमिक्स मे हरयाणवी बोली भी संग नु कल लो. यहाँ घने पंखे बैठे है संजय ताऊ जी और वा की कॉमिक्स के. रे अगर हरयाणवी मे राज कॉमिक्स आ जावे तो म्हारा तो घी सा गल जावे. और सारे ताऊ जियो को लग रिया हो के यो हरयाणवी मे छापने से चिडिया ना उड़न वाली तो झाग मत ना बिलोवो बस इतना सुन लो के थारी हिंदी कॉमिक्स मे थोडा 'हरयाणवी Flavor' भी पेल दिया करियो. इतता तो ढेडे के बीज भी कल लेंगे. मै किसी भासा का नास का ना फोड़ रहा मै तो यो ही चाहूँ के बंगाली, भोजपुरी, गुजराती, सिन्धी, तमिल, उर्दू, और निरे भारत की भासाओ का फ्लेवर राज कॉमिक्स अपनी कॉमिक्स मे देती रहवये. केवल "साडा की होऊ...., etc" की पीपणी ना बजाती फिरे. अच्छा तो जी.....अब इस blog पर ज्यादा थूक के पकोडे मत ना तारो.

नमस्कार!!"

Tuesday, June 22, 2010

कॉमिक्स की दुनिया मे अमर जोड़ियाँ




ये जोड़ियाँ कुछ हटकर है क्योकि ये आम जोड़ियों की तरह नहीं है बल्कि ये साथ आई है अपराध का नाश करने के लिए. और सिर्फ अपराध का नाश ही क्यों ये जोड़ियाँ तो खुद मे सम्पूर्ण है चाहे वो अपने साथी के लिए दबी भावनायें हो या समय-समय पर हास्य. हालाकि, कॉमिक्स और मनोरंजन के बाकी साधनों मे एकल नायको का वर्चस्व है पर फिर भी भारतीय कॉमिकस मे एक से ज्यादा मुख्य किरदार वाली कॉमिक सीरिज की कमी नहीं है. किसी बड़ी समस्या के सामने अकेले नायक के विचार और दो मुख्य किरदारों की सोच बड़ी अलग होती है. कई बार तो विचारो का टकराव या मतभेद बहुत रोमांचक स्थितियां पैदा करते है. 2 मेन लीड किरदार होने से उनसे जुड़े सहायक किरदारों की संख्या भी अमूमन एकल हीरो की सीरिज की तुलना मे बढ़ जाती है. वैसे ऐसी भी सीरिज है जहाँ कोई सहायक किरदार मुख्य किरदार की तरह लगातार बड़ी भूमिकायें निभाता है पर फिर भी हीरो तो हीरो ही रहता है और साइड हीरो को अक्सर "साइड" मे कर दिया जाता है. आशा है पाठको को और विस्तृत और हटकर मनोरंजन के लिए ऐसी जोड़ियाँ आती रहेंगी.


(1) - राज कॉमिक्स -

कोबी - भेड़िया,

फाइटर टोड्स,

हंटर शार्क फोर्स (किंग कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित जो राज कॉमिक्स की एक इकाई थी).

(2) - मनोज कॉमिक्स -

राम - रहीम,

अमर - अकबर,

अकडू जी - झगडू जी,

अमर - रहीम - टिंगू,

मशीनी लाल - अफीमी लाल,

मनकू - झनकू,

सागर - सलीम,

विनोद - हामिद .


(3) - पवन कॉमिक्स -

राम - बलराम.

(4) - राधा कॉमिक्स -

राजा - जानी,

शंकर -अली,

विनोद - हनीफ.

(5) - डाइमंड कॉमिक्स -

चाचा - भतीजा,

मोटू - पतलू,

मोटू - छोटू,

छोटू - लम्बू,

अग्निपुत्र - अभय,

लम्बू - मोटू,

अंडेराम - डंडेराम,

आल्तुराम - फाल्तुराम,

मंगलू मदारी - बंदर बिहारी,

मामा - भांजा,

राजन - इकबाल.

Wednesday, June 16, 2010

Social Comics यानी सामाजिक चित्रकथायें





किसी भी सफल और बड़े व्यवसाय मे सबसे बड़ा हाथ उस जनता का होता है जिसको वो व्यवसाय किसी भी तरह का फायदा देता है और बदले मे लोग उस उद्योग को सफल बनाते है. वैसे तो अब अधिकतर कॉमिक्स प्रकाशन बंद हो चुके है पर डायमंड कॉमिक्स, राज कॉमिक्स और अभी हाल ही मे दोबारा शुरू हुई अमर चित्र कथा भी ऐसे सफल और प्रगतिशील प्रकाशन है. वैसे तो ये कॉमिक प्रकाशन अपना काम बखूबी निभा रही है पर फिर भी समाज के प्रति उसकी कुछ जिम्मेदारियां और ऋण बनते है. मै चाहता हूँ की राज कॉमिक्स, आदि को अपने ये ऋण "Social Comics" या "सामाजिक चित्रकथा" नामक सीरीज़ प्रकाशित करके उतारना चाहिए. अगर कुछ कॉमिक्स का ये प्रयास सफल होता है तो इसे आगे भी जारी रखा जा सकता है. हालाकि, "World Comics India" नामक संस्था सामाजिक विषयों पर कॉमिक्स प्रकाशित करती है पर उसका स्तर और पहुँच अभी सीमित है.


वैसे राज कॉमिक्स सामाजिक विषयो को आधार बना कर अपने किरदारों पर कॉमिक्स छापती रही है. इन किरदारों मे प्रमुख है डोगा, गमराज, तिरंगा, शक्ति, आदि. पर किसी किरदार के साथ ऐसे सामाजिक विषयो का प्रकाशन ठीक नहीं क्योकि उस किरदार की कहानी ही उस सामाजिक विषय और उस से जुडी बातों पर हावी हो जाती है. जिस वजह से ऐसी बातों पर पाठको का ध्यान नहीं जाता और लेखको, कलाकारों के प्रयास व्यर्थ हो जाते है.

इसलिए मुझे लगता है की "अन्य सीरीज़" की तरह ऐसे विषयों को लेकर अलग से एक सीरीज़ बननी चाहिए जिसमे हर कॉमिक मे किसी नए मुद्दे को उठाया जाये. जहाँ तक ऐसे विषयो की बात है तो उनकी कमी नहीं है... सामाजिक भेद-भाव, ग्रामीण कुरीतियाँ, दहेज़ उत्पीडन, घरेलु हिंसा, गरीबी, भुखमरी, यहाँ तक की प्रमुख रूप से शहरो मे होने वाली Ragging, Eve Teasing जैसी समस्याओ को भी शामिल किया जा सकता है. सिर्फ इन समस्याओं को दिखाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए बल्कि इनके हो सकने वाले प्रमुख संभावित समाधान और पाठको को सीख भी मिलनी चाहिए. इन कॉमिक्स का सबसे बड़ा फायदा ये होगा की आम लोगो का कॉमिक्स के प्रति सुना सुनाया नजरिया बदलेगा की कॉमिक्स केवल बच्चो के लिए होती है.

राज कॉमिक्स की वेबसाइट पर मैंने 'eve teasing' पर "बड़ी देर हो गयी!" नामक परिकल्पना भी पोस्ट की है. जिसका वेबलिंक ये है. -

http://www.rajcomics.com/index.php?option=com_content&view=article&catid=17%3Astory-plots&id=1915%3ABadi-Dair-ho-Gayi&Itemid=246&lang=en

आप लोग Social Comics/सामाजिक चित्रकथा के बारे मे क्या सोचते है?

तुलसी कॉमिक्स





1980 के दशक और 1990 की शुरुआत मे तुलसी कॉमिक्स काफ़ी लोकप्रिय थी. लेकिन राज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स और मनोज कॉमिक्स से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा और ज्यादातर साधारण कहानियो और कला वाली कॉमिक्स के कारण तुलसी कॉमिक्स आख़िरकार बंद हो गई. इस प्रकाशन के प्रमुख किरदार थे अंगारा, तौसी, जम्बू, बाज़, योशो, योगा, आदि. इनके अलावा तुलसी कॉमिक्स नई और जनरल कहानियो पर कॉमिक्स प्रकाशित करती थी जो भूत - प्रेत, राजा - रानी, पौराणिक, जादू - टोना, तिलिस्म, आदि पर आधारित होती थी. तत्कालीन प्रतिस्पर्धा मे बाकी कॉमिक प्रकाशन मुख्य किरदारों को जोड़ियों मे निकालने का फार्मूला लाये थे जैसे मनोज कॉमिक्स ने राम-रहीम, अमर-अकबर, सागर-सलीम, आदि सीरीज प्रकाशित की, डायमंड कॉमिक्स ने चाचा-भतीजा, मोटू-पतलू, राजन-इकबाल, आल्तुराम-फाल्तुराम, आदि सीरीज निकाली. पर तुलसी कॉमिक्स ने ऐसी कोशिशे नहीं की.


साथ ही तुलसी कॉमिक्स की कोई 'self contained' (यानी एक कॉमिक मे पूरी होने वाली कहानी की) कॉमिक कम ही छपती थी. ऊपर से उनकी ज्यादातर कहानियो मे नयापन नही होता था. उनकी बहुत सी कॉमिक्स फिल्म्स, विदेशी उपन्यासों की कॉपी होती थी. तुलसी पॉकेट बुक्स से जुड़े कुछ उपन्यासकारों ने भी तुलसी कॉमिक्स के लिए कहानियाँ भी लिखी है जिनमे सबसे प्रमुख है मेरठ के जाने माने लेखक श्री वेद प्रकाश शर्मा. उन्होंने मुख्यतः जम्बू सीरीज के लिए काम किया. जो भी हो तुलसी कॉमिक्स के रूप मे भारतीय कॉमिक उद्योग के एक स्तंभ का दुखद अंत हुआ. आशा है की आगे ऐसे कई कॉमिक प्रकाशनों के साथ कॉमिक्स का स्वर्णिम युग ज़रूर लौटकर आएगा.


नमस्ते! इस ब्लॉग परिवार के सभी सदस्यों और इसके पाठको को. मेरा नाम मोहित शर्मा है और मै लखनऊ, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ. मै इक्कीस वर्षीय परास्नातक छात्र हूँ. बाकी जानकारी आगे देता रहूँगा.

Wednesday, May 12, 2010

Recess, क्या आपने सुना है इसके बारे में?

आज फिलहाल इसका यह वीडियो देखिये, जिसमे बच्चों ने कैसे अर्थशास्त्र के फंडे पढाया है.. हर पूंजीवादी व्यवस्था कुछ-कुछ ऐसी ही होती है, जैसा कि इसमे दिखाया गया है.. अगली बार इस कार्टून के बारे में विस्तार से बताता हूँ.. फिलहाल सिर्फ इतना बताता जाता हूँ कि मुझे डिस्नी के बनाए सभी कार्टूनों में से सबसे बढ़िया अभी तक यही लगा है और इसे देखने के लिए मैं कई बार रात के ढाई बजे तक जगता था(उन दिनों यह उसी समय आता था).. :)


Sunday, April 25, 2010

"खाकी और खद्दर" राजनीति का अपराधीकरण के बाद

मुझे राज कामिक्स कि सबसे बड़ी खूबी यह दिखती है कि अक्सर यह हमारे आस पास होने वाली ही किसी घटना को उठाकर कहानी का जाल बुनती है.. खासतौर से अगर डोगा या फिर इसके थ्रिल होरर कामिक्स कि बात करें तो आप यह जरूर पायेंगे.. जिस कारण से इसकी कहानियां अपने आस पास कि ही कोई कहानी कहती सी लगती है..

अभी कुछ दिन पहले मैंने Raj Comics पर एक होरर कामिक्स पढ़ी जिसका नाम था रोतडी.. इसमे हरियाणा और उसके आस पास के पंचायतो द्वारा ढाने वाले जुल्मो को लेकर कहानी आगे बढ़ाई गई थी और बाद में उसमे शन्नो चुड़ैल को जोड़ कर उस अन्याय के विरूद्ध खड़ा कर दिया गया था.. कुल मिलकर अगर कहूँ तो अक्सर यह महसूस होने लगता है कि काश असल जिंदगी में भी कोई डोगा या फिर अप्राकृतिक शक्ति आकर ऐसे ही हमें उन सामाजिक जुल्मो के विरोध में खड़ा होना सिखाए जो इन कामिक्स के नायक/नायिका करते हैं..

खैर, आज मैं यहाँ बताने आया हूँ खाकी और खद्दर के बारे में.. यह कामिक्स जिस समय आई थी उन दिनों गुजरात में हुए फर्जी एनकाउंटर को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ था.. पुलिस, मीडिया और राजनीतिज्ञ, सभी जगह सिर्फ वही मुद्दा छाया हुआ था.. इस कामिक्स कि शुरुवात भी होती है एक फर्जी एनकाउंटर से जो मुंबई के किसी हिस्से में हुई है और वह एक ऐसे पुलिस वाले कि करतूत थी जो अपने अन्डरवर्ल्ड के आकाओं को बचाने के लिए झूठी इन्फार्मेशन देकर वह फर्जी एनकाउंटर करवाता है.. बाद में जब वह पकड़ा जाता है तब वह राजनीति में घुस कर क़ानून को अपने इशारों पर नाचना शुरू कर देता है..

यह कामिक्स "शेर का बच्चा" का ही सिक्वेल है.. तो जाहिर सी बात है कि सूरज अब डोगा नहीं बनने कि राह पर निकल चुका है..(जानने के लिए पढ़े "शेर का बच्चा".. सूरज भी मोनिका और अन्य आम जनता कि तरह ही इस गुंडागर्दी का तमाशा देखना शुरू कर देता है.. सूरज फिर से डोगा क्यों और कैसे बना, यह आपको इस कामिक्स के जरिये जानने को मिलेगा..

अगर मेरी राय पूछे तो यह कामिक्स डायलोग और कहानी के नाम पर बेहद उम्दा है, हाँ मगर इसमे डोगा के एक्शन कि कमी जरूर खलेगी.. मेरी राय में इसकी रेटिंग चार है पांच में(****4/5)..

डाउनलोड लिंक - खाकी और खद्दर (भाग २)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..


डाउनलोड लिंक - शेर का बच्चा (भाग १)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..




डाउनलोड लिंक - खाकी और खद्दर (भाग २)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..


डाउनलोड लिंक - शेर का बच्चा (भाग १)
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..


वैसे जब आप इस कामिक्स को डाउनलोड करके पढ़ना शुरू करेंगे तो पहले दो-तीन पृष्ठों पर पायेंगे कि मेरा नाम लिखा हुआ है, और कहीं "प्रशान्त डोगा" लिखा हुआ है.. असल में "शेर का बच्चा" और "खाकी और खद्दर" आने के बाद मैं डोगा का इतना बड़ा फैन हो गया था कि दीदी मुझे डोगा ही कह कर बुलाने लगी थी.. और वह हैंडराइटिंग भी मेरी दीदी कि ही है.. :)


Doga related posts and Doga's Comics for free download

Saturday, April 24, 2010

शेर का बच्चा सूरज

इस कहानी का सारा ताना बना बुना गया है सूरज, डोगा, मोनिका, चीता, अदरक चाचा और चंद समाज के बेहिसाब दौलत और ताकत रखने वाले भेड़ियों पर.. डोगा के कम ही कामिक्स में ऐसे गजब की चित्रकारी, डायलॉग, एक्शन, इमोशन और सिक्वेंस एक साथ देखने को मिलेगा.. कुल मिला कर अगर मुझे इस कामिक्स को रेटिंग देने को कहा जाए तो मैं इसे पांच में चार दूँगा(****4/5)..

अब तक सूरज(नए आने वालों के लिए - सूरज ही डोगा है) को पता चल चुका होता है कि उसकी सोनू जो बीहड़ के घने जंगलों से भागते समय नदी कि धारा में बह गई थी वह मोनिका ही है, मगर मोनिका को यह नहीं पता होता है कि सूरज ही डोगा है.. मोनिका डोगा से बेहिसाब नफ़रत करती होती है, क्योंकि उसके हिसाब से डोगा का तरीका सही नहीं है.. उसका यह भी मानना होता है कि अगर सभी डोगा कि ही राह अपना लें तो इस समाज का कोई नाम लेने वाला भी बचा नहीं रहेगा..

मोनिका का भाई चीता को इस बात इल्म हो चुका था कि सूरज ही डोगा है, मगर अभी तक वह भी यह समझ चुका था कि इस समाज को डोगा कि जरूरत है.. घटनाक्रम कुछ ऐसा मोड़ लेती है कि डोगा को भी पता चलता है कि चीता उसका राज जान चुका है, और वह किसी भी कीमत पर अपना राज जानने वाले को जिन्दा नहीं छोड़ सकता है.. इसी जूनून में वह अपनी बन्दूक कि सारी गोली चीता के सीने में उतार देता है और वह भी मोनिका के सामने ही.. बाद में मोनिका को भी पता चल जाता है सूरज ही वह डोगा है जिसने अभी अभी उसके भाई को गोली मारी है.. इसी बीच अदरक चाचा डोगा और चीता-मोनिका के सामने दीवार बन कर सामने आ जाते हैं..

कुल मिला कर इस जबदस्त कामिक्स को पढ़ना ना भूलें.. और कुछ नहीं तो मेरी बात पर भरोसा करें कि "यह कामिक्स जबरदस्त है"..

चलते चलते बताता चलूँ, कि यह मेरे द्वारा स्कैन करके नेट पर अपलोड की जाने वाली पहली कामिक्स थी.. जो डोगा कि नेट पर उपलब्ध पहली ई-कामिक्स भी थी.. :)

डाउनलोड लिंक : शेर का बच्चा
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..




डाउनलोड लिंक : शेर का बच्चा
संजय गुप्ता जी के अनुरोध पर डाउनलोड लिंक हटाया जा रहा है..



आगे आने वाले कामिक्स के नाम :
  • खाकी और खद्दर (डोगा)

  • खूनी खानदान (ध्रुव)

  • अतीत (ध्रुव)

  • जिग्सा (ध्रुव)


एक दफ़े ये सभी पोस्ट हो जाने के बाद नागराज के उन कामिक्स को कुरेदा जायेगा जो नागराज कि शुरुवाती कामिक्स थी और अब बाजार में भी उपलब्ध नहीं है.. :)

नागायण - वरणकांड

यह कामिक्स श्रृंखला मेरी नजर में राज कामिक्स का अभी तक के बिक्री का सारा रिकार्ड तोड़ डाले थे.. आज मैं इसके पहले भाग का प्रस्तावना जैसा ही कुछ ले कर आया हूँ, जिसमे इसके प्रमुख पात्रों का जिक्र है..

मैंने जब से ये ब्लॉग शुरू किया है तभी से अपने ही बनाये इस नियम को मानता चला आ रहा हूँ कि मैं कोई भी ऐसा कामिक्स का लिंक यहाँ ना दूँ जो पिछले दो वर्षों मे आया हो या फिर अभी भी उसकी खूब बिक्री हो रही हो.. मैं कुछ भी ऐसी सामग्री यहाँ नहीं डालना चाहता हूँ, जिससे कामिक्स इंडस्ट्री पर कुछ भी बुरा असर ना हो, जिससे भविष्य में और भी कामिक्स पढ़ने को मिले.. :) मगर फिर भी मुझे अफ़सोस के साथ कहना पर रहा है कि लगभग सभी नई-पुरानी कामिक्स इस अंतर्जाल पर कहीं ना कहीं बिखरे पड़े हैं..

फिलहाल तो आप इस कामिक्स के कुछ झलकियाँ देखें..

प्रमुख पृष्ठ :



नागराज :



ध्रुव :



नागपाशा :



नताशा :



विसर्पी :



बाबा गोरखनाथ :


Thursday, April 22, 2010

जब प्रतिशोध लेने कि बात करने वाला पिट गया, मेरा मतलब विलेन :)

सन 1996 कि बात है, उस जमाने में कामिक्स का नशा सर चढ़ कर बोला करता था(वैसे बोलता तो अभी भी वैसे ही है :D).. मगर घर में पापा-मम्मी कामिक्स के धुर-विरोधी हुआ करते थे.. मगर एक दिन "जैसे हर कुत्ते का एक दिन होता है" मेरा भी दिन आया, और पापा जी मुझे बोले कि "जाओ बच्चा तुम्हे सौ रूपये देता हूँ.. इसमें जितना कामिक्स खरीद सकते हो खरीद लो.." उनकी यह वाणी मुझे किसी आकाशवाणी से कम नहीं लगी.. ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में देवकी के ब्याह के समय कंस को आकाशवाणी सुनाई दिया था.. (वैसे कभी कभी सोचता हूँ कि महाभारत काल और उसके आस पास के काल मे इत्ते सारे आकाशवाणी क्यों लोगों को सुनाई देता था?? :o ;))

अब एक अंधे को क्या चैये, बस दो ऑंखें.. उस समय मैं बिक्रमगंज नामक शहर में रहता था, जो बिहार के रोहतास(सासाराम) जिले में अवस्थित है.. वहाँ राज कामिक्स मिलता नहीं था और मैं अपने अमूल्य सौ रूपये डायमंड कामिक्स के चाचा चौधरी जैसे कामिक्स पर खर्च करने को तैयार नहीं था.. अब विकट स्थिति जान पड़ी.. करें तो क्या करें.. बस संभाल कर रख लिया वह सौ रूपया, सोचा "केकयी" जैसे ही समय आने पर इसका उपयोग करूँगा और बेचारे पापा मना भी नहीं कर पायेंगे..

फिर वो दिन भी आया जब पापाजी को किसी मीटिंग में डेहरी-ऑन-सोन जाना था और साथ में हम भी लटक लिए.. पापाजी गए मीटिंग के अंदर और हम उनके बॉडीगार्ड साहब को लेकर पहुँच गए वहाँ के रेलवे स्टेशन.. ध्रुव या नागराज का कोई कामिक्स तो मिल ही जायेगा, इसी उम्मीद में.. और वहाँ से ख़रीदे तीन कामिक्स.. तीनो के तीनो ही ध्रुव के..
  • "स्वर्ग कि तबाही"

  • "दलदल" और

  • "ब्लैक कैट"


जिसमे से स्वर्ग कि तबाही ध्रुव कि एक दूसरी कामिक्स का आखरी भाग था, उसके पहले भाग का नाम आदमखोरों का स्वर्ग था.. इन दोनों कामिक्स को मैं पहले भी आपके सामने ला चुका हूँ जिसका लिंक उन कामिक्स के नाम के साथ दे रहा है मैंने.. Link Deleted on request of Sanjay Gupta Ji..

दूसरी कामिक्स "दलदल" अपने आप में पूरी कामिक्स थी.. आगे पीछे कोई भी रोवनहार नहीं था उस कामिक्स का, मतलब कोई दूसरा भाग नहीं था.. :)

और तीसरी कामिक्स "ब्लैक कैट" के साथ भारी पंगा हो गया.. लेते समय मैंने देखा नहीं और पढ़ने पर पता चला कि यह तो पहला भाग है.. अब दूसरा भाग कहाँ से आये.. भारी लोचा.. अब तो पटना आयें तो यहाँ पता करे उसके दूसरे भाग के बारे में.. डेहरी-ऑन सोन जाए तो फिर वही चक्कर.. पटना के पुस्तक मेला में भी मेरे घूमने कि वजह सिर्फ यही कामिक्स थी(उस जमाने में साहित्य भगोरों में मेरा नाम अव्वल हुआ करता था सो किसी साहित्यिक पुस्तक मैं खरीदने से रहा.. वैसे मेरा मानना है कि कामिक्स भी साहित्य के ही किसी श्रेणी का हिस्सा है :)).. "रोबो का प्रतिशोध" नाम था उसके दूसरे भाग का.. सबसे बड़ी मुसीबत तो यह कि पहले भाग में ध्रुव को बुरी तरह घायल दिखा दिया था.. मन में सवाल यह नहीं था कि वह बचा या नहीं, क्योंकि उसकी नई कामिक्स लगातार आ रही थी(ही ही ही :D).. सवाल यह था कि वह बचा तो कैसे बचा..

खैर एक दिन ब्रह्म देव मुझ पर भी प्रसन्न हुए और मेरी मुह मांगी मुराद पूरी हो गई.. मुझे यह कामिक्स मिली पटना जंक्शन के पास वाले एक बुक स्टोल पर(मीठापुर सब्जी मार्केट के कोर्नर वाला बुक स्टोर).. और पढकर दिल को उतनी ही ठंढक मिली जितनी कि एक बच्चे को कुत्ते कि पूंछ खिंच कर मिलती है(ही ही ही :D)..

फिलहाल तो आप भी इसे पढ़िए.. :)



चूंकि इसमें अपनी कुछ यादें भी जुडी हैं सो सोचता हूँ कि इसे अपने दूसरे ब्लॉग पर भी डाला जाए.. :) शायद तीन-चार दिन बाद..

Sunday, April 18, 2010

बज्ज पर बज-बजाते कामिक्स दीवाने

एक दिन बस यूँ ही गूगल बज्ज पर मैंने एक मैसेज दिया "सुनो बज्ज गांव वालों.. क्या कोई Super Commando Dhruv(SCD) कि कामिक्स पढ़ना चाहता है?? अपना Email ID मुझे दिया जाए.. हर दिन एक कामिक्स उन्हें मेल कि जायेगी.. :D" और देखते ही देखते कामिक्स के दीवाने जुट गए वहाँ.. मैं अपना वादा तो नहीं निभा पाया "मतलब हर दिन ध्रुव कि एक कामिक्स मेल करने कि".. मगर फिर भी जिस किसी ने कोई डिमांड रखी और अगर वह कामिक्स मेरे पास थी तो मैंने उन्हें उसी समय मेल कर दिया..


"प्रतिशोध कि ज्वाला" का पहला पृष्ठ

कुछ दोस्तों कि चुहलबाजी भी शामिल थी वहाँ, तो कुछ लोग ऐसे भी थे जो पहली बार ध्रुव कि कामिक्स ट्राई करना चाह रहे थे.. मैंने पाया है कि पहली बार ध्रुव को ट्राई करने वालों में हमसे एक पीढ़ी पहले के लोग होते हैं.. मैंने अपने एक पोस्ट में लिखा भी था कि "हर पीढी का अपना एक नायक होता है.. जैसे मुझसे 10-15 साल पहले वाली पीढी के लोगों के लिये वेताल और मैंड्रेक नायक हुआ करते थे.. उस समय भारत में इंद्रजाल कामिक्स का प्रभुत्व हुआ करता था.. सो उस पीढी के नायक भी उसी प्रकाशन से छपने वाली कामिक्स की हुआ करती थी.. ठीक वैसे ही मेरी पीढी के लिये नायक ध्रुव और नागराज जैसे हीरोज हैं.."

अब जैसे जैसे लोगों ने रिप्लाई करना शुरू किया, मैंने उन्हें पहली कामिक्स भेजनी भी शुरू कर दी.. वह कामिक्स ध्रुव कि भी पहली कामिक्स थी.. "प्रतिशोध कि ज्वाला" जिसे मैंने पहले भी इस ब्लॉग पर कभी पोस्ट किया था..

सबसे पहले स्तुति जी आई जिन्होंने कामिक्स पाने के बाद तुरत बांकेलाल कि कामिक्स "बांकेलाल और राजसी तलवार" के लिए पेशकश भी कर दी, जिसे मैं ठीक से पढ़े बिना यह समझा कि वह बांकेलाल कि कामिक्स चाह रही हैं.. :)

डा.महेश सिन्हा जी आकर चिढा गए, बोले "बिल कब भेजोगे?" मैंने भी स्पोर्ट स्पिरिट दिखाते हुए उसी मजाक में कह दिया "महेश जी, अभी तो फ्री में बाँट रहे हैं.. एक बार लत लगने दीजिए फिर पैसा कमाएंगे.. :D"



इन सब के बीच स्तुति के कहने पर(बोले तो ऑन डिमांड :D) मैंने "चाचा चौधरी साबू और फुटबाल" सभी को मेल भेजना शुरू किया.. और बाद में "बिल्लू का समोसा" कि भी बारी आई..



तो पूरी बात का लब्बोलुआब यह हुआ कि इस एक पोस्ट में आपके सामने लेकर आया हूँ मैं चार कामिक्स :) जिसमे से एक मैं पहले भी यहाँ ला चुका हूँ, मतलब तीन नए कामिक्स.. फिलहाल तो आप इस पोस्ट में दिए लिंकों का चक्कर लगा कर तीनों कामिक्स ढूंढें और मजे लें.. मैं जान बूझ कर सभी लिंक इकट्ठे नहीं दे रहा हूँ, कुछ मेहनत आप भी तो करें.. ही ही ही.. :D

Wednesday, February 17, 2010

पहला प्यार और नताशा


मुझे वह अच्छी लगाती थी, और मैं उसे कभी-कभी नताशा कह कर बुलाता था.. वह मुझसे पूछती थी कि ये नताशा कौन है, मैं बस कहता कि ऐसे ही.. अब उससे कौन कहे कि मेरा पहला प्यार का नाम नताशा ही है.. मैं दिल ही दिल में खुदा को शुक्रिया अदा करता था कि वह कामिक्स नहीं पढ़ती थी.. कुल मिलकर कुछ ऐसा ही नशा हुआ करता था उस कामिक कैरेक्टर का..

पिछले पोस्ट में गौतम जी ने मुझे भी मेरा पहला प्यार याद दिला दिया.. मेरा शुरू से ये मानना रहा है कि हर पीढ़ी का अपना अलग हीरो होता है.. जैसे मुझ से ४-५ साल पहले कि पीढ़ी का वेताल हुआ करता था कमोबेश वैसा ही मेरे उम्र के लोग अपना हीरो ध्रुव और नागराज जैसे कैरेक्टर में ढूँढते रहे.. फिर कब जवान हुए और कब प्यार हुआ कुछ पता ही नहीं चला.. मेरी कई मित्र भी हैं जिसे अपना पहला प्यार ध्रुव या डोगा में दिखता रहा है, वहीँ कईयों को नागराज भी खूब भाता रहा है..

नताशा का पहला परिचय ग्रैंड मास्टर रोबो में कराया गया था.. मैंने बहुत पहले कभी ग्रैंड मास्टर रोबो नामक कामिक्स पोस्ट भी की थी जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं.. नताशा का पिता रोबो जो अपराध की दुनिया का बादशाह हुआ करता था, जब तक की वह ध्रुव से नहीं टकराया था.. नताशा उसके रोबो ट्रूप्स की कमांडर हुआ करती थी.. फिर जब वह चंडिका उर्फ श्वेता को जान पर खेल कर उसकी जान बचाते देखती है तो अपराध की दुनिया छोड़ देती है.. वैसे पूरी कहानी पढ़ने के लिए आप ग्रैंड मास्टर रोबो वाले लिंक से उस कामिक्स को डाउनलोड कर सकते हैं..

अब बढते हैं अगले प्रेम की ओर.. ऋचा.. वह भी ध्रुव के कामिक्स की ही कैरेक्टर है.. जो छद्म वेश रखकर ब्लैक कैट भी बनती है और अपराधियों से भी लड़ती है.. खाली समय में वह जिमनास्ट है, वही साथ में एक सुपर कम्प्युटर जीनियस भी.. आप फिलहाल ब्लैक कैट की पहली कामिक्स पढ़े, बाकी अगले पोस्ट में अपने एक और प्यार के साथ लौटता हूँ.. वैसे भी यह कामिक्स दो भागों में बनती हुई है.. सो मुझे जल्द ही आना है दूसरा भाग पोस्ट करने के लिए.. :)

"ब्लैक कैट" कामिक्स का डाउनलोड लिंक


आप कामिक्स डाउनलोड करने के लिए ब्लैक कैट कामिक्स की तस्वीर पर भी क्लिक कर सकते हैं..

Sunday, February 14, 2010

वेलेंटाइन-दिवस पर अपनी कामिक्स वाली माशुकाओं की याद में...

.....एक पूरा अर्सा ही बीत गया था इस ब्लौग पर कुछ लिखे हुए। आज अचानक वेलेंटाइन-दिवस के इस प्रेमोत्सव पर कुछ लिखने का मन आया तो स्वभाविक रुप से उन माशुकाओं की याद आयी जिनके साथ पला-बढ़ा हूँ। वेलेंटाइन-दिवस...पूरे सप्ताह के अलग-अलग दिनों को अलग-अलग नामों और अलग-अलग ढ़ंग से मनाती एक पूरी पीढ़ी मुझे अचानक से प्रौढ़ हो जाने का अहसास दिलाती है...और इस अहसास से उदास हुआ मन धम्म से बैठ जाता है कुछ पुरानी यादों का पुलिंदा खोल कर। मन का वो आशिक-कोना, जो एक बचपने में ही जवान हो गया था और अब तलक जवानी की उस चौखट पर सर रगड़ रहा है, उसी पुलिंदे से निकालता है एक फ़ेहरिश्त अपनी चंद चिरयुवा प्रेमिकाओं की। नहीं, इस "प्रेमिका" शब्द से धोखा न खायें। ये पूर्णतया एकतरफा इश्क का मामला है।...मामला है? नहीं, "मामले हैं" कहना उचित होगा। आइये नजर दौड़ाइये मेरे साथ ही इस फ़ेहरिश्त पर कि जानता हूँ मैं कि मेरे जैसे जाने कितने ही जवान हुये वो बचपन वाले आशिकों की फौज ने किस-किस जतन से इस फ़ेहरिश्त को संभाले रखा है युगों-युगों से।

फ़ेहरिश्त की क्रमवार सूचि में भले ही ढ़ेरों दुविधायें हों, किंतु पहले स्थान पर निर्विवाद रूप से डायना थी, है और रहेगी- अनंत काल तक। हैंग ऑन! हैंग ऑन!! मैं प्रिंस चार्ल्स वाली राजकुमारी डायना
की बात नहीं कर रहा। मैं बात कर रहा हूँ डायना पामर की...अपने, हमसब के हीरो वेताल उर्फ फैंटम उर्फ चलते-फिरते प्रेत की प्रेयसी और पत्‍नि डायना की। वो पहली नजर का पहला प्यार वाला
किस्सा था डायना के संग। उधर वेताल को हुआ, इधर मुझे भी। इंद्रजाल कामिक्स के उन पन्नों में मंडराती किसी स्वप्न-सुंदरी सदृश ही डायना एकदम से दिन का चैन और रातों की निंदिया उड़ा ले गयी थी उन दिनों। ये उन दिनों की बात है, जब अपने फैंटेसी की मनमोहक दुनिया बसाया हुआ बचपन सहर्ष ही किट और हेलोइश जैसे प्यारे-प्यारे जुड़वां बेटे-बेटी का पिता कहलाने को तैयार था। हवा-महल के उन सुहाने दिनों में, बौने बंडारों के जहर बुझे तीरों के सुरक्षा-घेरे में, खोपड़ीनुमा गुफा की उन ठंढ़ी तलहटियों में, शेरा और तूफान के संग वाली सैरों में और वेताल के साथ-साथ ही मंडराती चुनौतियों के खिलाफ़ छेड़ी हुई जंगों में...खिलखिलाती मचलती हुई डायना...उफ़्फ़्फ़्फ़!!! ...और जब अपने मि० वाकर उर्फ चलते-फिरते प्रेत ने प्रणय-निवेदन किया था हमारी डायना से और फिर डायना का उस निवेदन को सहर्ष स्वीकारना...आहहा! कैसा माहौल था वो खुशनुमा!! मानो डायना ने हमारा प्रणय-निवेदन ही स्वीकारा हो प्रत्यक्षतः.... :-) शायद याद हो आपसब को कि शादी में सुदूर ज़नाडु से चलकर अपना प्यारा जादूगर खुद मैण्ड्रेक भी आया था समारोह में हिस्सा लेने।

...और मैण्ड्रेक के साथ ही याद आती है प्रिसेंज नारडानारडा के ही महल के बगीचे में मैण्ड्रेक का इजहार अपने प्यार का राजकुमारी नारडा के प्रति और फिर

नारडा का ज़नाडु में स्थानंतरित होना लोथार और मोटे बटलर का साथ देने, शायद इंद्रजाल कामिक्स की दुनिया का एक और शो-केस इवेंट था। इसी फ़ेहरिश्त में यूं तो बेला भी शामिल थी, लेकिन बीतते वक्त के साथ उसकी तस्वीर तनिक धुमिल हो गयी है। बहादुर की बेला। कहानी के प्लाट में तमाम विविधतायें होते हुये भी बेला का तनिक रफ और टफ व्यक्तित्व मुझे ज्यादा रास नहीं आता। कराटे में वैसे तो डायना भी ब्लैक-बेल्ट थी, लेकिन फिर भी उसकी नजाकत और उसके जिस्म का लोच एक अलग ही अफ़साना बयान करते थे।

फ़ेहरिश्त में आगे चंद और विदेशी नायिकाओं का आगमन होता है। यकीनन लुइस लेन मेरे लिये
डायना के समक्ष ठहरती है। डेली प्लानेट के सौम्य और मृदुभाषी रिपोर्टर क्लार्क केंट की दोस्त और प्रेयसी जब क्लार्क केंट को सुपरमैन के ऊपर तरजीह देती है, एक झटके में मेरा दिल ले जाती है। बात उन दिनों की है जब अचानक से इंद्रजाल कामिक्स का प्रकाशन बंद हो गया था और विदेश से आनेवाले मेरे एक रिश्तेदार ने मेरे कामिक्स-प्रेम को देखते हुये मेरे लिये चंद डीसी और मार्वल कामिक्स का पूरा सेट उपहार में लेकर आये थे। उन दिनों जब डायना दिखनी बंद हो गयी थी, लुइस लेन आयी थी एक बहुत ही मजबूत विकल्प बन कर। सुपरमैन की प्रेयसी किसी भी मामले में कहीं भी सुपरमैन से कम नही थी{है}। याद आता है मुझे क्लार्क कैंट और लुइस का विवाह और उन दिनों किसी कारणवश सुपरमैन अपनी सारी शक्तियाँ खो चुका था, तब तमाम विपदाओं से लड़ती हुई लुइस लेन ने अकेले ही क्लार्क कैंट को मुसिबतों से निकाला था। लुइस लेन और मेरा प्रेम-प्रसंग अभी जारी है कि हर महीने मेरे पास अभी भी डीसी कामिक्स से सुपरमैन के निकलने वाले तीन टाइटल्स लगातार आ रहे हैं।

...और इसी जारी प्रेम-प्रसंगों की एक सबसे प्रबल प्रतिभागी है मेरी जेन। जी हाँ, अपने नेक्स्ट डोर
नेबर पीटर पार्कर उर्फ स्पाइडर मैन की मेरी जेन । दि बोल्ड एंड सेन्सुअस मेरी जेन...उफ़्फ़्फ़! उन तमाम बनते-बिगड़ते रिश्तों की उलझनें, उन तमाम विलेनों के संग की उठा-पटक, उन तमाम रातों की चिंतित करवटें जब पीटर अपने स्पाईडी अवतार में दुश्मनों की बैंड बजा रहा होता है...मैंने मेरी जेन का साथ निभाया है। इस लिहाज से मैं कई बार चक्कर में भी पड़ जाता हूँ। चक्कर में कि मेरी जेन या डायना पामर...?? मेरी या डायना...??? और इस चक्कर में डायना का पलड़ा भारी करने हेतु मैं कभी इंटरनेट पे तो कभी कबाड़ियों और पुराने दुकानों के गर्द पड़ चुके कोनों में फैंटम कामिक्सों को तलाशते रहता हूँ। इंद्रजाल कामिक्स के लुप्तप्राय हो जाने के बावजूद अब भी जुड़ा हुआ हूँ येन-केन-प्रकारेन फैंटम की दुनिया से...तो डायना का पलड़ा हमेशा भारी ही रहता है।

इसी फेहरिश्त में कहीं पर सेलिना भी है। सेलिना....कैट वोमेन...बैटमेन की प्रेमिका। वैसे शायद प्रेमिका कहना अनुचित होगा। क्योंकि सेलिना का अपराधिक-चरित्र और बैटमैन का अपराध को समूल नाश करने का लिया गया वचन इस प्रसंग को आगे बढ़ने से रोकता है। किंतु अपने अल्टर-इगो में ब्रुस वेन कही-न-कहीं सेलिना के प्रति झुकाव तो महसूस करता ही है और उसी झुकाव की वजह से हम बैटमैन के चाहनेवाले भी दिलोजान से कामना करते रहते हैं कि ये खूबसूरत सेलिना छोड़ क्यों नहीं देता है चोरी-चकारी।

...और यहाँ से फेहरिश्त वापस मुड़ती फिर से होम-ग्राउंड की ओर।
ध्रुव की सहचरी कमांडर नताशा हो या फिर नागराज की प्रेयसी विसर्पी हो या
हो अपने डोगा की संगिनी सोनु उर्फ मोनिका । कुछ और नाम भी जुड़ते चले
जा रहे हैं, लेकिन पोस्ट तनिक लंबी होती जा रही है। ...तो फेहरिश्त की अगली किश्त फिर कभी फुरसत में जब अगली
बारआता हूँ पोस्ट लिखने। तब तक के लिये मेरे ही जैसे आपसब तमाम आशिकों को सलाम...!

.....

Wednesday, January 20, 2010

सज़ा-ए-मौत - सुपर कमांडो ध्रुव (Saja-e-maut - Super Commando Dhruv)

शायद सन् 1998-99 के आस पास इस कामिक्स को पढ़ा था.. और पढ़ते ही दिवाना हो गया था.. तब से लेकर अभी तक ना जाने कितनी ही बार इस कहानी को पढ़ चुका हूं..

इस कामिक्स कि कहानी शुरू होती है बार्को नामक एक माफिया किंग के अड्डे से, जो ग्रैंड मास्टर रोबो के लिये काम करता है.. किसी कारण से वह सुपर कमांडो ध्रुव को अपने रास्ते से हटाना चाह रहा था(इसके पीछे कि कहानी जानने के लिये हमें "कमांडर नताशा" कामिक्स में झांकना पड़ेगा, वह फिर कभी).. साथ ही वह यह भी जानता था कि धुव को मारना लगभग असंभव सा काम है.. बार्को यूरोप के अपराध संघटन से एक हत्यारे को मंगाता है जिसके लिये उसने खूब पैसा खर्च किये हैं.. बार्को इस उम्मीद में बैठा था कि शायद कोई बेहतरीन खूनी हत्यारा अत्याधुनिक हथियारों के साथ राजनगर, भारत आयेगा.. मगर वह यह देख कर आश्चर्यचकित रह जाता है कि एक ऐसा व्यक्ति आया है जो अपना नाम "स्किमो" बता रहा है और उसके पास एक ब्लेड तक नहीं है जिससे किसी इंसान कि हत्या की जा सके..

इस कामिक में "स्किमो" नामक कैरेक्टर बेहतरीन गढ़ा गया है.. उसके पूरे शरीर पर कट्टम-कुट्टा वाले खेल के निशान बने हुये हैं, और जो भी उसके लिये काम करता है उनके हाथों पर भी वैसे ही निशान बने रहते हैं.. मुझे समझ में नहीं आता है कि कहानियों और सिनेमा में ऐसे विलेन किरदार क्यों बनाये जाते हैं जिनके गिरोह के सभी सदस्य के शरीर के किसी ना किसी हिस्से में ऐसे निशान बने होते हैं.. मुझे मैन्ड्रेक के कामिक्स का "अष्टांक" नामक किरदार याद आ रहा है.. वहां भी कुछ वैसा ही लोचा था..

खैर स्किमो पर वापस आते हैं.. स्किमो बार्को को समझाता है कि अगर किसी हथियार से ध्रुव को मारा जा सकता तो ध्रुव कभी का इस दुनिया से उठ गया होता.. क्योंकि वह अपना भेष बदल कर या मुखौटा लगा कर सुपर हिरोगिरी नहीं करता है.. उसके सभी पहचान भी खुले हुये हैं, और उसके अनगिनत दुश्मन भी हैं.. अपने नाम के ही अनुसार स्किमो स्कीम बना कर मारता है.. और उसने स्कीम कुछ ऐसा बनाया है जिससे कि ध्रुव को कानून ही "सज़ा-ए-मौत" कि सजा सुना दे तो ध्रुव कानून के खिलाफ कभी नहीं जायेगा..

अब आगे कि कहानी को जानने के लिये आपको यह कामिक्स पढनी होगी, इस कामिक्स को पढ़ने के इच्छुक व्यक्ति इस लिंक से जाकर कामिक्स खरीद सकते हैं..



मेरा रेटिंग - **** (4/5)