Friday, August 22, 2008

मिलिये हमारे कवि गुरू से

सबसे पहले गुरू देव के सम्मान में उनकी कुछ कविताऐं -

एक डाल से तू है लटका,
दूजे पे मैं बैठ गया..
तू चमगादड़ मैं हूं उल्लू,
गायें कोई गीत नया..

घाट-घाट का पानी पीकर,
ऐसा हुआ खराब गला//
जियो हजारों साल कहा पर,
जियो शाम तक ही निकला..






ये कवि आहत कैसे लगे मुझे जरूर बताईयेगा.. मैं ना जाने कितनी ही बार बालहंस की प्रतिक्षा बस कवि आहत को पढने के लिये करता था.. अनंत कुशवाहा जी द्वारा संपादित ये कविताऐं बेहद जबरदस्त हुआ करती थी.. मैं समय समय पर इनकी कार्टून स्ट्रीप आपलोगों के सामने लाता रहूंगा.. :)

13 comments:

  1. अरे वाह.. ये तो बालहंस वाले कवि आहत लगते है.. ये तो हमारे भी गुरु है.. इन्होने हमे भी एक कविता सुनाई थी..

    "ऊँट लेता ना इस करवट ना उस करवट
    हम ही करवट बदलके रेगिस्तान हो गये"

    ReplyDelete
  2. कितने ही कवि हुए आहत। पढ़कर अच्छा लगा।

    ReplyDelete
  3. भाई वह "कवि आहत" सचमुच गजब के है

    ReplyDelete
  4. बहुत बालहँस पढी थी.. लाजबाब थी.. बहुत मजा आता था..

    और हाँ.. ठोलाराम याद है न?

    ReplyDelete
  5. बहुत आभार मित्र, जो गुरु जी के दर्शन सुबह सुबह करवाये दिये, जय हो!! अब आपके पास आये हैं गुरु जी तो बिना कुछ सीखे मत छोड़ना. :)

    ReplyDelete
  6. भई ये तो बहुत ही अलग हैं आगे भी जारी रखने के लिए धन्यवाद

    ReplyDelete
  7. haa haa haa..
    maja aa gayaa..
    jaree rakhe.

    ReplyDelete
  8. घाट-घाट का पानी पीकर,
    मेरे आगे आया था
    उस को अंदेशा था कि
    मैं ही बस सच्चा निकला

    ऐसा भी होता है !!

    ReplyDelete
  9. aapne to bachpan ki duniya me pahucha diya.

    ReplyDelete
  10. बालहंस और कवी आहत :) :) आज भी पुराने अंक की तलाश ने रहता हूँ

    ReplyDelete
  11. Mai bhi bachpan se he inka bhot bda fan rha hu

    ReplyDelete
  12. Mai bhi bachpan se he inka bhot bda fan rha hu

    ReplyDelete